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कभी बनाते थे पंचर अब लेंगे अरुण जेटली की जगह.

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आज हम एक ऐसे इंसान की बात करने जा रहे हैं जिसका नाम शायद ही आपने कभी सुना हो. यूँ तो NDA सरकार में बड़े बड़े नेताओं के नाम से लिस्ट भरी पड़ी लेकिन आज बात उनकी की जा रही है जिनका इतिहास शायद ही कोई जानता हो लेकिन वर्तमान में उन्हें वो सम्मान मिला है जो शायद किसी बड़े नेता को मिला हो.

हम बात कर रहे है थावरचंद गहलोत की, जिन्हें हाल ही में राज्यसभा में NDA का नेता बनाया गया है. इस बात का वजन इसी बात से समझ आता है कि, इस पद पर पहले अरुण जेटली थे. जेटली के पॉलिटिकल और मीडिया मैनेजमेंट पर महाकाव्य रचा जा सकता है.

मध्य प्रदेश में एक जिला है नागदा, ये एक औद्योगिक कस्बा है. जो आसपास के लोगों को रोज़गार देता है. थावरचंद गहलोत की जब जमी हुई नौकरी चली गई, तब उन्होंने अपने परिवार के साथ इसी कस्बे में एक पंचर की दूकान खोली। इनके पिता नागदा की ग्रेसिम इंडस्ट्रीज में बतौर मजदूर काम किया करते थे. उस समय नागदा मंडी के पास एक संघ की शाखा चलती थी. थावर ने शाखा जाना शुरू किया. उस समय वो 7 वीं क्लास में पढ़ा करते थे. इसके बाद से लगातार संघ से जुड़े रहे.

मध्य प्रदेश में जनसंघ की मज़बूत पकड़ थी. थावरचंद का मजदूर संघ के साथ काम जारी था. इस बीच देश में आपातकाल लग गया. 1975 से 1977 के बीच. इस दौरान इन्होंने लगभर एक साल की कैद की सज़ा काटी। बाहर आये तो संघ के स्थानीय नेतृत्व ने भी उनकी जमकर पैरवी की. नतीजा यह हुआ कि 1980 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का टिकट थमा दिया गया और गहलोत चुनाव जीत गए और इस तरह थावरचंद गहलोत के राजनीतिक करियर की शुरुआत हुई. मध्य प्रदेश के मालवा इलाके में दलित वोट ठीक-ठाक तादाद में है. लिहाजा थावरचंद को संगठन में आगे बढ़ाया जाने लगा.
1990 में मध्य प्रदेश में भाजपा की पहली बार सरकार बनी, उसके मंत्रिमंडल में एक और नाम शामिल था थावरचंद का.

2012 में थावरचंद को मध्य प्रदेश से भेजापा की ओर से राज्यसभा में भेजा गया. अब दौर ये आ गया था कि, मोदी को इस बात की ज़रुरत महसूस हुई कि, अगर मध्य प्रदेश में अपने कदम जमाने है तो दलितों में अपनी पैठ बनाना ज़रूरी है. इसी रणनीति के तहत थावरचंद को संघ और भाजपा दोनों में आगे बढ़ाया जाने लगा. थावरचंद गहलोत को नरेंद्र मोदी सरकार में सामाजिक न्याय मंत्रालय सौंपा गया. कई विशेषज्ञों का मानना है कि, थावरचंद की पकड़ राजनीति में अब उतनी मज़बूत नहीं रही जितना पहले हुआ करती थी. 2018 के विधानसभा चुनाव में वो अपने बेटे जितेंद्र गहलोत को आलोट सीट से चुनाव नहीं जीता पाए. लेकिन दलितों के बीच अपनी पकड़ को मजबूत करने की रणनीति के तहत थावरचंद गहलोत को राज्य सभा बीजेपी की कमान सौंपी गई है.

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