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Medha Milk

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,रोजा तोड़ कर बचाई हिन्दू युवक की जान

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मेरा मज़हब इश्क़ का मज़हब जिस में कोई तफ़रीक़ नहीं

मेरे हल्क़े में आते हैं ‘तुलसी’ भी और ‘जामी’ भी.

शायर कैशर शमीम के  इस शेर को मानों सच्चाई मिल गयी जब  असम के रहने वाले मुस्लिम युवक पन्नाउल्लाह  ने अपना रोज़ा तोड़ कर एक हिन्दू युवक की ज़िन्दगी बचाई.

चलिए हम आपको आगे की पूरी कहानी बताते हैं.

मीडिया रिपोर्ट की माने तो  पन्नाउल्लाह अहमद को उनके दोस्त तपस भगवती ने फोन कर बताया कि एक हिंदू युवक को खून की जरूरत है। पन्नाउल्लाह और तपस दोनों एक साथ रहते हैं,दोनों साथ ही काम करते हैं। अहमद के पास जैसे  ही तपस का फोन आया, वह बिना कुछ सोचे-समझे तुरंत हॉस्पिटल पहुंच गया और अपना  रोजा तोड़ कर पीड़ित रंजन को खून दिया। रंजन को ट्यूमर है और उनका का इलाज गुवाहाटी के अपोलो अस्पताल में चल रहा है. रंजन असम के धेमाजी जिले के रहने वाले हैं

रंजन को B+ ग्रुप के ब्लड की जरूरत थी :

दरअसल, 8 मई को  अहमद और तापश को पता चला कि रंजन को B+ ग्रुप के ब्लड की ज़रुरत है तो उन्होंने कई डोनर्स से संपर्क किया, लेकिन कोई उपलब्ध नहीं हो पाया। अहमद ने अपने दोस्तों से भी कहा कि अगर रोजा के दौरान कोई खून देना चाहता है तो उससे संपर्क कर सकता है. इसके बाद अहमद ने खुद ही रक्तदान करने का फैसला किया.

अहमद ने आगे बताया कि रक्तदान  करने से पहले उन्होने कई बुज़ुर्ग और इस्लाम के जानकारों से पूछा कि क्या वो रोज़ा के दौरान किसी को खून दे सकते हैं तो उन्हें  मालूम चला कि दे सकते हैं लेकिन रोज़ा रहते हुए रक्तदान करने से खुद की  तबियत बिगड़ सकती है. इसके बाद अहमद ने अपना रोज़ा तोड़ा और रंजन को खून दिया. अहमद और

तपस हमेशा से रक्तदान करते आएं है और हमेशा अपने दोस्तों और जान-पहचान के लोगों को रक्तदान करने के लिए जागरूक भी करते हैं.

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