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राजनाथ की नजर चीन, पाकिस्तान से निपटने पर, लेकिन बड़े रक्षा सुधार लागू करने की चुनौतियां

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भारत के सभी रक्षा प्रतिष्ठान अब आशा कर रहे हैं कि राजनाथ सिंह जैसे बड़े और फुलटाइम मिनिस्टर मिलने से सैन्य मॉडर्न के काम जल्दी-जल्दी होंगे। इसके अलावा, लंबे वक्त से रुके-पड़े कई बड़े रक्षा सुधार जैसे जरूरी कामों को रफ़्तार मिलेगी।

नयी दिल्ली। देश के सारे रक्षा प्रतिष्ठान अब उम्मीद लगाए बैठे है कि उन्हें राजनाथ सिंह जैसे दिग्गज फुलटाइम मिनिस्टर मिलने से सैन्य साजो-सामान के आधुनिकीकरण के साथ अब लंबा वक्त नहीं लगेगा।

साथ ही, रुके-पड़े कई बड़े रक्षा सुधार जैसे जरूरी काम तेजी से होंगे, क्योंकि डिफेन्स मॉडर्नाइजेशन की काफी जरूरत भी है। इसके अलावा, तीनों सेनाओं के एक चीफ जैसे ढांचागत सुधार का भी काफी लम्बे समय से इंतजार होता दिखता था, वह भी अब खत्म होगा।

नये रक्षा मंत्री के तौर पर राजनाथ सिंह के सामने चुनौतियों की कोई कमी नहीं है, क्योंकि चीन और पाकिस्तान से खतरे के चैलेंज से निपटने और भारत के रक्षा-औद्योगिक यानी डिफेन्स- इंडस्ट्रियल बेस को बढ़ाने की चुनौती तो है ही। दुनिया का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश भारत ही है और छोटे-मोटे हथियारों से लेकर वह बड़े रक्षा उपकरणों के लिए भी खासतौर पर आयात पर टिका हुआ है। ऐसे में, भारत को इस झंझट से निकलने की जरूरत है।

2014 से ही पीएम मोदी की पहली एनडीए सरकार ने इनसे निपटने के लिए कुछ जरूरी शुरुआती काम किये थे। यूं तो देश के सारे रक्षा प्रबंधन यानी डिफेन्स मैनेजमेंट को दुरुस्त करने के लिए जिन सुधारों की जरूरत है, वैसे कदम अब भी नहीं उठाये गये हैं।

पीएम मोदी के पिछले कार्यकाल में अरुण जेटली 2 बार रक्षा मंत्री बने। इसके बाद मनोहर पर्रिकर और निर्मला सीतारमण भी मंत्रालय में रहीं।

एक सीनियर अफसर ने कहा कि राजनाथ सिंह का राजनीतिक कद काफी बड़ा है, इस कारण वह कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्यॉरिटी में मजबूत दखल दे पाएंगे। वित्त मंत्रालय में कई डिफेन्स प्रपोजल लटक जाते हैं। इस बार, निर्मला सीतारमण के पास वित्त मंत्रालय है, वे खुद 20 महीने तक रक्षा मंत्री रही हैं, इसलिए मंत्रालय की जरूरतों को ठीक से समझती भी हैं।

डिफेन्स मिनिस्टर के तौर पर राजनाथ सिंह को तुरंत जिस बात को ऊपर रखना होगा, वह सुरक्षा बलों के लिए पर्याप्त हथियार-बारूद का भंडार पक्का करना है। 15 लाख आर्म्ड फोर्सेज के पास गोले-बारूद का भंडार इतना तो होना ही चाहिए कि यदि वॉर जैसी सूरत पैदा हो जाए, तो कम से कम ये 10 दिन तक तो चले ही। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कई सौदे पर पहले ही साइन हो चुके हैं और कई दूसरे पर अभी होने हैं।

इसके अलावा, सशस्त्र बल- Security forces को पनडुब्बियों, लड़ाकू विमानों, हेलिकॉप्टरों, एयर डिफेंस सिस्टम और पैदल सैनिकों के लिए जरूरी हथियारों और रात में युद्ध के काम वाले जरूरी उपकरण की कमी दिख रही है। इसका हल निकलना ही होगा।

रक्षा मंत्री राजनाथ को डीआरडीओ-DRDO (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) और उसकी अपनी
50 प्रयोगशालाओं के कार्यों में बड़े सुधार की जरूरत है, इसके लिए सख्त कदम उठाने होंगे। इसके अतिरिक्त 4 डिफेंस शिपयार्ड्स, 41 ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों के प्रदर्शन/उत्पादकता के साथ ही 5 डिफेंस PSUs में सुधार वक्त की जरूरत भी है। निजी क्षेत्र को भी रक्षा उत्पादन में उतारने की जरूरत है। पिछले 5 साल में सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ के तहत लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर, इन्फैंट्री कॉम्बेट वीइकल, डीजल इलेक्ट्रिक सबमरीनंस जैसे रक्षा उपकरणों से जुड़े प्रॉजेक्ट्स को 5 डिफेंस PSUs के तहत शुरू किया है।

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