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29 मई से ऐतिहासिक मेला शुरू

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इस बार माता भद्रकाली जी का ऐतिहासिक मेला 29 और 30 मई आयोजित हो रहा है. मां भद्रकाली मंदिर सम्पूर्ण रूप से वैष्णव जय मां भद्रकालीस्वरूपा हैँ, ये ‘ब्रह्मचारिणी’ नाम से भी जगप्रसिद्ध हैँ. तीन पवित्र स्वरूपों की पूजा होने के कारण ये जहां प्रतिष्ठापित की जाती हैँ, वह स्थान परम वैष्णवी माना जाने लगता है. मान्यता है कि कुछ स्थान स्वयंभू स्वरूप एवं ज्योतिर्लिंगों सदृश पूजे जाते हैँ,

आदि काल से लिंग स्वरूप या ज्योतिपुंज के रूप में मां भद्रकाली की पूजा की जाती है. शक्ति को समर्पित मां पूजा स्वरूप में मां सरस्वती, मां लक्ष्मी या फिर मां काली के अलग-अलग रूपों में भक्तों, योगियों और धर्माचार्यों के बीच अनंत काल से पूजी जाती हैँ, लेकिन भारत में एक या दो विशेष स्थल ऐसे भी हैँ, जहां पर शक्ति के तीनों स्वरूप एक ही स्थल पर ‘स्वयंभू रूप’ अर्थात लिंग स्वरूप में प्रतिष्ठापित हैँ.

अनंत काल से उनकी उपासना की अनवरत परंपरा चली आ रही है। भद्रकाली मन्दिर में आकर मां के तीनों स्वरूपों- महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती पूजी जाती हैँ। यहां पर तीर्थ यात्री या भक्त अपनी मनोकामना रखकर आते हैँ, वह जरूर पूर्ण होती है.

मां भद्रकाली की ऐतिहासिक गुफाजय मां भद्रकाली की एक रहस्यमय गुफा है. गुफा के नीचे-नीचे से नदी का प्रवाह बना रहता है और गुफा के ऊपर मंदिर बनाया गया है। सम्वत् 986 ई. (यानी सन् 930) में एक महान संत ने इस मंदिर में शांति के लिए पूजा का विधान बनाया,

मंदिर के आचार्य पद खंतोली सेजो मंदिर के शिलापट पर अंकित है। इस स्थल पर हर तरह के धार्मिक आयोजन- पूजा, कथा, पुराण वाचन, व्रत आरम्भ की सौगंध और नवरात्र व्रत पूरी निष्ठा से निरंतर चलते दिखाई देते हैँ। मंदिर में पूजा के निमित्त चंद राजाओं के दौर से आचार्य और पुजारियों के इंतजाम किये गये हैँ। मंदिर के आचार्य पद खंतोली के पंथ समुदाय को दिये गये हैँ.

साथ ही मंदिर में पूजा-व्यवस्था बनाये रखने के लिये गांव कुचौली के चंद राजाओं द्वारा आचार्यों को दान में कुछ धार्मिक उपहार दिये गये हैँ. जिस कुचौली में कुशंडी ऋषि ने तपस्या की थी और जिसकी वजह से इसका नाम कुसौली पड़ा. आज ये गांव कुचौली नाम से प्रसिद्ध है लेकिन पुजारी पद गांव भद्रकाली के जोशी वंश के लोगों को दिया गया है।

भद्रकाली मंदिर उत्तराखंड के कुमाऊं मण्डल में बागेश्वर जिले में बागेश्वर मुख्यालय से 30 किलोमीटर पूर्व में पर्वत की मनमोहक वादियों के बीच स्थित है। आम तौर पर मां जगदम्बा मंदिर और शक्ति स्थल पहाड़ी की चोटियों पर अवस्थित है, लेकिन ये मंदिर अन्य शक्ति स्थलों के विपरीत चारों ओर स्थित चोटियों के बीच घाटी में है।

इन पर्वत चोटियों पर नाग देवताओं के मंदिर विराजमान हैं। उदाहरण के लिए धौलीनाग देवता, फेरीनाग देवता, बेरीनाग देवता, बासुकी नाग देवता आदि। मंदिर परिसर चारों ओर हरे-भरे पेड़ों से घिरा है। यहां की प्राकृतिक सुंदरता समूचे परिसर में पधारने वाले यात्रियों का मन बरबस ही मोह लेती है।

भद्रकाली से एक नदी निकलती है, जिसे भद्रा नदी नाम से हम जानते हैँ। ये मंदिर नजदीक स्थित पहाड़ी
से निकल कर मंदिर परिसर के नीचे से करीब 300 मीटर तक बहती है. इस कारण एक प्राकृतिक गुफा भी बन चुकी है, ये गुफा हजारों साल पुरानी बताई जाती है।

दैवीय बाधाएं शांत होती हैं यहां

गुफा के भीतर कई तरह की लिंग सरीखी आकृतियां बनी दिखती हैँ। यह भू-वैज्ञानिकों के रिसर्च का विषय है। इस गुफा में एक कुंड है जिसमें बाहर से आने वाले तीर्थयात्री स्नान करते हैँ। प्राचीन मान्यता है कि इस कुंड में स्नान से दैवीय बाधाएं शांत हो जाती हैँ। कहते हैँ कि यहीं पर मां के चरण स्थल हैं. यहां मां के चरणों का पूजन होता है.

छोटी गुफा में भगवान शंकर

इसके बाद जग जननी मां भद्रकाली जगदम्बा के पूजन के बाद श्रद्धालु छोटी-सी गुफा में भगवान शंकर के दर्शन के लिए पहुंचते हैँ, यहां भोले बाबा मंदिर परिसर स्थित शक्ति पिंडों के एकदम नीचे स्थित हैँ. यहां भगवान शिव की मूर्ति ध्यानस्थ मुद्रा में वह भी पद्मासन अवस्था में स्थित है। गुफा के भीतर एक तरफ भगवान शिव हैँ और दूसरी ओर दिखती गुफा हजारों साल पुरानी है.

शंकर विश्वाधार रूप में ध्यानस्थ

कहते हैँ कि इसे प्रकृति ने बनाया है. जो अलग-अलग रूपों में दिखती है और जिनको निहार कर यात्री ख़ुशी से भर जाते हैँ। यहां की खासियत है कि भगवान शंकर विश्वाधार रूप में ध्यानस्थ हैँ। ऊपर की ओर मां जगदम्बा विश्वेश्वरी के तीन रूपों में मां सरस्वती यानी ज्ञान रूप में, मां लक्ष्मी संपत्ति रूप में, मां काली पुरुषार्थ एवं जननी-स्वरूप में स्थित हैँ।

भद्रकाली तीनों रूपों में

इस स्थल पर शिव और शक्ति का मिलाजुला स्वरूप है, जो एक-दूसरे का आधार रूप हैँ। मां भद्रकाली तीनों स्वरूपों में आ रहे भक्तों और यात्रियों के दैहिक और दैविक आपदाओं का निवारण करती हैँ, जिसके कारण हम पूरी श्रद्धा, आस्था और विश्वास से मां की आराधना करते हैँ. मां भद्रकाली की अपार शक्ति और उसके प्रति भक्ति का एक प्रसंग प्रचलित है.

शांडिल्य ऋषि की स्थली ‘सानि उडियार’

प्राचीन काल में इस आध्यात्मिक भूमि पर संत आया करते थे, क्योंकि यह स्थान अल्मोड़ा के बागेश्वर कांडा सानि उडियार से बेरीनाग, थाल, डीडीहाट, अश्कोटि और धारचूला होते हुए, कैलाश यात्रा मार्ग रहा है। साधुओं और तपश्चर्या में रमे लोगों को यहां मनमोहक स्थान मिला, वहीं तपस्या लीन होते गये। यही नहीं, यहीं शांडिल्य ऋषि की स्थली ‘सानि उडियार’ नाम से प्रसिद्ध है।

मां को अर्पित भोग

आज वहां पर गुफा भी मौजूद है। ऋषि पतंजलि और वाल्मीकि आदि के तप से जुड़े कथानक भी हैँ। यहां उच्च धार्मिक विधान के अनुसार, वर्तमान समय में पूजा-अर्चन का नियम चला आ रहा है। यहां पर रोज मां को भोग अर्पित किया जाता है, मां को भोग रूप में सिर्फ मिष्ठान या दूध से ही बना भोग चढ़ाया जाता है. यहां जनेऊ धारण अनुष्ठान भी होते हैँ.

धार्मिक आयोजन

कई संस्कार, मुंडन, सत्यनारायण व्रत कथा, श्रीदेवी भागवत आदि धार्मिक आयोजन भक्तजन दूर से आकर करवाते हैँ। चैत्र महीने की अष्टमी पर यहां मेला लगता है. मेले की पूर्व-संध्या पर जागरण भजन कीर्तन का अनोखा आयोजन भी किया जाता है। दूसरे दिन मेला लगता है। आजकल यातायात के आसान साधन हो जाने से आसानी से लोग यहां आते-जाते हैँ,

ठहरने आदि के इंतजाम

मंदिर में यात्रियों के ठहरने के लिये धर्मशाला, भोजन बनाने के लिये बर्तन, रात विश्राम के दौरान कम्बल आदि की व्यवस्था भी मंदिर समिति की ओर रहती है। वर्तमान मंदिर समिति यात्रियों की सुविधाओं का ध्यान रखते हुये इस धार्मिक स्थल की पहचान दूर-दूर तक करने में जुटा दिखता है. मंदिर प्रशासन ने एक वेबसाइट भी मुहैया कराई है।

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