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Medha Milk

4 से 6 किलोमीटर तक की दूरी तय करनी पड़ती है अपनी प्यास बुझाने क लिए.

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शहरों में ज़मीन क भीतर जल का स्तर घटता जा रहा है. शहरी आबादी का पानी की किल्लत से जूझना हमेशा चर्चा में रहता है.लेकिन ग्रामीण इलाके जहां बोरिंग न हो, पानी की सुविधा न हो और तो और जहाँ झरने भी सूख गये हो उन इलाकों में रहने वालों की जिंदगी बिना पानी के बद से बदत्तर हो जाती है.

कुछ ऐसी ही परिस्तिथि से गुज़र रहे हैं झारखण्ड के गुमला जिला के बिशनपुर प्रखंड स्थित सिरका पंचायत के आदिम जनजाति असुर बहुल के कई टोले. जहां लोगों को चार से छ: किलोमीटर तक की दूरी तय करनी पड़ती है अपनी प्यास बुझाने क लिए.

सेरका एवं विशुनपुर पंचायत में आदिम जनजाति समूह के असुर एवं विरीजिया परिवार रहते हैं. इनकी अजीविका पहले वन उपज और पशुपालन पर निर्भर थी, जो अब बदलती जा रही है.

इनकी अजीविका का मुख्य स्रोत अब श्रम आधारित हो गया है.
इन परिवारों के पास खेती लायक ज़मीन काफी कम है. कुछ परिवारों क पास पहाड़ी ढलान पर 10 डिसमिल से 2 एकड़ तक ज़मीन जरूर है. लेकिन वहां धान की खेती नहीं होती है.

आमदनी का श्रोत जलावन की लकड़ी

मंजिरापाट में रहने वाली ललिता असुर कहती है, पाठ इलाके में पानी की बहुत कमी है. बोरिंग भी नहीं है, झरना ही एक मात्र उपाय है जिस पर हम निर्भर हैं.

बरसात में आदिम जनजाति परिवार के पास अपनी खेती लायक ज़मीन कम होने के कारण उरांव एवं खेरवार आदिवासी समूह के खेतों में महिला और पुरूष कृषि मजदूर बन कर काम करते हैं. साल में तक़रीबन 80 से 90 दिन ही लकड़ी बेच पाते हैं बाकि समय उन्हें मज़दूरी कर अपना पेट भरना पड़ता है.

धान कटने के बाद जल संकट और रोजगार के साधन नही होने की वजह से गांव के कई परिवार साल के 6 महीने पलायन कर ईंट-भट्टा में काम करने चले जाते हैं. जहां वह अपने परिवार के सभी सदस्यों को भी साथ ले जाते हैं. इन सब के बिच सबसे अधिक दिक्कत बच्चों को होती है. उनका स्कूल छूट जाता है और बच्चे शिक्षा से दूर हो जाते हैं.

बीते दस साल से इस इलाके के लोगों को राज्य सरकार पशुपालन से जुड़ने की कोशिश में लगी है. लेकिन पेयजल की समस्या और सही तरीके से योजनाएं लागू न होने के वजह से सरकार को सफलता नहीं मिल सकी है.

इसका कारण पूछने पर मालूम चला कि बकरी पालन, मुर्गी पालन, सुअर पालन आदि योजना का लाभ तो मिल रहा है, लेकिन सही तरीके से उपचार न मिलने के वजह से घर क पशुओं के साथ सरकारी योजना के तहत मिले जानवरों की भी मौत हो जाती हैं.

इलाके में अच्छी सड़क भी नहीं हैं जिसके वजह से आने-जाने और अपना जीवन चलाने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ता हैं. स्वास्थ्य सुविधा न होने की वजह से लोगों को परंपरागत रूप से ही अपना इलाज करना पड़ता हैं.

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