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130 करोड़ के देश में ‘बीमार’ स्वास्थ्य व्यवस्था बनी 90 फीसदी मौत की वजह

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भारत का स्वास्थ्य विभाग समेत ज्यादातर चिकित्सा संस्थान बीमार हैं. ऐसा इसलिए क्यूंकि लचर स्वास्थ्य सेवाओं के वजह से भारत में जब भी कोई स्वास्थ्य आपदा आती है तो भारत उससे लड़ नहीं पता है.

हाल ही में बिहार में चमकी बुखार (AES) से 150 से अधिक बच्चों की मौत हो गयी. इसकी बहुत बड़ी वजह वहां की स्वास्थ्य सेवाओं की खस्ता हालत भी थी. उससे पहले उत्तर प्रदेश के BRD अस्पताल में साल 2017 में 10-11 अगस्त को 30 बच्चों की मौत हो गयी थी. वहीं पांच में 70 से अधिक बच्चों की जान चली गयी थी. अभी कुछ दिन पहले आये नीति आयोग के रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य के मामले में सबसे ख़राब बताया गया.

2018 में वाशिंगटन यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित बीमारियों और मृत्यु दर पर एक वैश्विक आकलन ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (जीबीडी) के अनुसार, प्रति 100,000 लोगों पर 717.79 मौतों की दर के साथ, 2017 में भारत में 99 लाख मौतें हुईं थी. जो कि भयावाह है.

भारत में मधुमेह से 254,500, संक्रामक रोगों से 20 लाख और गैर-संचारी रोगों से 62 लाख मौतें हुई हैं.

इंडियास्पेंड के डाटा के मताबिक, भारत स्वास्थ्य पर बहुत कम खर्च करता है, भारत का सार्वजनिक खर्च 2015 में GDP का 1.02 फीसदी था, जैसा कि है.

जबकि 2017-18 में भारत का सार्वजनिक-स्वास्थ्य को बढ़ाया गया लेकिन कितना, 1.02 से बढ़ा कर 1.4 फीसदी कर दिया. लेकिन क्या ये भारत की आबादी को नज़र में रखते हुए काफी है ? नहीं बिलकुल नहीं, भारत की पूर्व स्वास्थ्य सचिव के सुजाता राव ने 13 मई, 2019 को ट्विटर पर लिखा था कि स्वास्थ्य पर कम से कम 8% जीडीपी आवंटित करने की आवश्यकता है.

यदि हम बात करें दूसरे देशों कि तो, मालदीव कि आबादी 4.36 लाख है, वहां कि सरकार द्वारा स्वास्थ्य पर खर्च किए जाने वाले सकल घरेलू उत्पाद का अनुपात 9.4 फीसदी है, श्रीलंका में 1.6 फीसदी, भूटान में 2.5 फीसदी और थाईलैंड में 2.9 फीसदी है.

अगर हम स्वास्थ्य बजट की तुलना रक्षा बजट से करें तो मालूम होगा कि स्वास्थ्य बजट रक्षा बजट का लगभग आधा है.

इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस, के अनुसार, 2017-18 में रक्षा बजट 4.31 लाख करोड़ रुपये था या जीडीपी का 2.5 फीसदी था.

साल 2017 में, आतंकवाद की वजह से 766 भारतीयों की जान गई थी. या यूं कहें कि होने वाली सभी मौतों में आंतकवाद से मौत की हिस्सेदारी 0.007 फीसदी थी. वहीँ दूसरी तरफ खराब स्वास्थ्य के कारण 66 लाख भारतीयों की मृत्यु हुई है.

भारत टीबी के सबसे अधिक बोझ वाला देश है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) 2016 के रिपोर्ट में बताया गया कि, भारत में टीबी के 2.79 मिलियन यानि 27 लाख 90 हज़ार मामले सामने आये थे.

इंडीआस्पेंड की 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में 2025 तक सार्वजनिक स्वास्थ्य-खर्च को GDP के 2.5 फीसदी तक बढ़ाने के बारे में बात की गई थी, लेकिन भारत अभी तक 2010 के लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाया है जो कि GDP का 2 फीसदी था.

हम समझ सकते हैं कि भारत सरकार को स्वास्थ्य क्षेत्र में ज्यादा खर्च करने की ज़रुरत है. ताकि हम स्वास्थ्य क्षेत्र में आने वाली त्रासदी से लड़ने के लिए भारत हमेशा तैयार रहे.

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