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दीपावली: क्या है पूजन का शुभ महूर्त, कौन से मंत्र से धन की वर्षा होगी ?

कार्तिक मास की अमावस्या पर लक्ष्मी जी की पूजा करने से सुख-समृद्धि आती है।

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दीपावली के दिन प्रत्येक व्यक्ति, वो चाहे व्यवसाय से हो, सेवा कार्य से हो या नौकरी से,  अपने व्यवसायिक स्थान एवं घर पर मां लक्ष्मी एवं गणेश जी का विधिवत पूजन कर धन की देवी लक्ष्मी से सुख-समृद्धि एवं गणेश जी से बुद्धि की कामना करता है।
कार्तिक मास की अमावस्या पर लक्ष्मी जी की पूजा करने से सुख-समृद्धि आती है। दीपावली की पूजा विशेष मुहूर्त में की जाती है। इन मुहूर्तों को उस समय के काल और लग्न की गणना के अनुसार निकाला जाता है। इस साल कार्तिक अमावस्या 14 नवंबर 2020, शनिवार को दोपहर 2 बजकर 18 मिनट के बाद से लग जाएगी।

जानिए संपूर्ण पूजन विधि वास्तु विशेषज्ञ ज्योतिषाचार्य श्री विमलेश जी से।

इस बार दीपावली पूजन का सर्वश्रेष्ठ मुहुर्त:

वृष लग्न- 14 नवम्बर 2020 शाम को 05.26 बजे से 07.23 बजे तक रहेगा।
सिंह लग्न- 14/15 नवम्बर 2020 रात में 11.49 बजे से 15 नवंबर की रात 02.26 बजे तक रहेगा।

दीपावली पूजन सामग्री

महालक्ष्मी पूजन में रोली, , कुमकुम, चावल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, धूप, कपूर, अगरबत्तियां, दीपक, रुई, कलावा (मौलि), नारियल, शहद, दही, गंगाजल, गुड़, धनिया, फल, फूल, जौ, गेहूँ, दूर्वा, चंदन, सिंदूर, घृत, पंचामृत, दूध, मेवे, खील, बताशे, गंगाजल, यज्ञोपवीत, श्वेत वस्त्र, इत्र, चौकी, कलश, कमल गट्टे की माला, शंख, लक्ष्मी व गणेश जी का चित्र या प्रतिमा, आसन, थाली, चांदी का सिक्का, मिष्ठान्न,21 दीपक इत्यादि वस्तुओं को पूजन के समय रखना चाहिए।

दीपावली पूजा

दीप स्थापना
सबसे पहले पवित्रीकरण करें। आप हाथ में पूजा के जलपात्र से थोड़ा-सा जल ले लें और अब उसे मूर्तियों के ऊपर छिड़कें। साथ में मंत्र पढ़ें। इस मंत्र और पानी को छिड़ककर आप अपने आपको पूजा की सामग्री को और अपने आसन को भी पवित्र कर लें।

ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा।
य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: वाह्याभंतर: शुचि:।।

अब पृथ्वी पर जिस जगह आपने आसन बिछाया है, उस जगह को पवित्र कर लें और मां पृथ्वी को प्रणाम करके मंत्र बोलें~

पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥

ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥
ॐ पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः
ऐसा बोलकर पृथ्वी पर जल, अक्षत, पुष्प डालें।

अब आचमन करें
ॐ केशवाय नमः
ॐ नारायणाय नमः
ॐ माधवाय नमः

निम्न मंत्र बोलते हुए हाथों को धो लें~
ॐ हृषिकेशाय नमः

आचमन आदि के बाद आंखें बंद करके मन को स्थिर कीजिए और तीन बार गहरी सांस लीजिए। यानी प्राणायाम कीजिए क्योंकि भगवान के साकार रूप का ध्यान करने के लिए यह आवश्यक है।

स्वस्तिवाचन
पूजा के प्रारंभ में स्वस्तिवाचन किया जाता है। उसके लिए हाथ में पुष्प, अक्षत और थोड़ा जल लेकर निम्नलिखित वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए परम पिता परमात्मा को प्रणाम किया जाता है।
ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्ध-श्रवा-हा स्वस्ति न-ह पूषा विश्व-वेदा-हा । स्वस्ति न-ह ताक्षर्‌यो अरिष्ट-नेमि-हि स्वस्ति नो बृहस्पति-हि-दधातु ॥

इसके बाद श्री गणेश-महालक्ष्मी पूजा का संकल्प किया जाता है। संकल्प हर एक पूजा में प्रधान होता है।

संकल्प

आप हाथ में अक्षत लेकर, पुष्प और जल ले लीजिए। कुछ द्रव्य भी ले लीजिए। द्रव्य का अर्थ है कुछ धन। ये सब हाथ में लेकर संकल्प मंत्र को बोलते हुए संकल्प कीजिए कि मैं अमुक व्यक्ति अमुक स्थान व समय पर अमुक देवी-देवता की पूजा करने जा रहा हूं, जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हों।

सबसे पहले गणेश जी व गौरी का पूजन कीजिए।

हाथ में अक्षत् लेकर ध्यान करें —
सर्वप्रथम भगवान् श्री गणेश जी का ध्यान करें~
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारूभक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम् ।।
माता भगवती गौरी का ध्यान करें~
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम: ।
नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्म ताम् ।।

श्रीगणेशाम्बिकाभ्यां नम: ध्यानं समर्पयामि कहते हुए अक्षत चढ़ा देवें।

भगवान् गणेश का आवाहन करें~

ॐ गणानां त्वा गणपति गुं हवामहे प्रियाणांत्वा प्रियपतिं गुं हवामहे निधीनां त्वा निधिपति गुं हवामहे वसो मम आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम ।।
एह्येहि हेरम्ब महेशपुत्र समस्तविघ्नौघविनाशदक्ष।
मांङल्यपूजाप्रथमप्रधान गृहाण पूजां भगवन् नमस्तुते।।
ऊँ भूभुर्व: स्व: सिद्धिबुद्धि सहिताय गणपतये नम:, गणपतिमावाहयामि,स्थापयामि, पूजयामि च।
हाथ के अक्षत गणेशजी पर चढ़ा दें ।
पुनः अक्षत लेकर गणेशजी की दाहिनी ओर गौरीजी का आवाहन करें ।
भगवती गौरी का आवाहन करें~

ॐ अम्बे अम्बिके अम्बालिके न मा नयति कश्चन ।
ससस्त्यश्वक: सुभद्रिकां काम्पील वासिनीम ।।
हेमाद्रितनयां देवीं वरदां शंकर प्रियाम् ।
लम्बोदरस्य जननीं गौरीम् आवाहयाम्यहम् ।।
ऊँ भूर्भुव: स्व: गौर्यै नम:, गौरीमावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि च ।

देव-प्रतिष्ठा~

ऊँ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु ।
विश्वे देवास इह मादयन्तामो 3 म्प्रतिष्ठ ।।
अस्यै प्राण: प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणा: क्षरन्तु च ।
अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन ।।
गणेशाम्बिके । सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम् ।
प्रतिष्ठापूर्वकम् आसनार्थे अक्षतान् समर्पयामि गणेशाम्बिकाभ्यां नम:।
(आसन के लिये अक्षत समर्पित करें)।
पाद्य, अध्र्य, आचमनीय, स्नानीय, पुनराचमनीय समर्पयामि।

ॐ देवस्य त्वा सवितु: प्रसवे श्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् ।।
एतानि पाद्याघ्र्याचमनीय स्नानीय पुनराचमनीयानि समर्पयामि गणेशम्बिकाभ्यां नम: ।
(इतना कहकर जल चढ़ा दें)।

कलश स्थापना

कलश स्थापना की संक्षिप्त विधि निम्नलिखित है~

कलश स्थापित किए जाने हेतु पहले से लकड़ी के एक पाटे पर अष्टदल कमल बनाकर रखें। उस पर धान्य बिछा दें। कलश (मिट्टी अथवा तांबे का लोटा) पर रोली से स्वास्तिक का चिन्ह बनाकर लोटे के गले में तीन धागे वाली मौली लपेटें व धान्य पर कलश रखकर जल से भर दें एवं उसमें चंदन, औषधि (जटामॉसी, शिलाजीत आदि), दूब, पाँच पत्ते (बरगद, गूलर, पीपल, आम, पाकड़ अथवा पान के पत्ते), कुशा एवं गौशाला आदि की मिट्टी, सुपारी, पंचरत्न (यथाशक्ति) व द्रव्य छोड़ दें।
नारियल पर लाल कपड़ा लपेटकर, चावल से भरे एक पूर्ण पात्र को कलश पर स्थापित कर उस पर नारियल रख दें। हाथ जोड़कर कलश में वरुण देवता का आह्वान करें :-

ॐ तत्वा यामि ब्रह्मणा वंदमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः।
अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुश गुं समान आयुः प्रमोषीः॥

हाथ जोड़कर प्रणाम करें।

‘ॐ अपांपतये वरुणाय नमः’ बोलकर कलश पर अक्षत, पुष्प अर्पित करें।

अब कलश पर सब देवताओं का ध्यान कर आह्वान करें एवं चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित कर पूजन करें। अब कलश के जल में देवी-देवताओं के आह्वान के लिए निम्न मंत्र का उच्चारण करें :-

ॐ कलशस्य मुखे विष्णुः कंठे रुद्रः समाश्रितः ।
मूले त्वस्य स्थतो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः ॥
कुक्षौ तु सागराः सर्वे, सप्तद्वीपा वसुंधराः ।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः ॥
अंगैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः ।
अत्र गायत्री सावित्री शांति पुष्टिकरी तथा ॥

ॐ अपां पतये वरुणाय नमः ।
ॐ वरुणाद्यावाहित देवताभ्यो नमः।
हाथ जोड़कर नमस्कार करें।

अंत में बोलें :-

‘कृतेन अनेन पूजनेन कलशे वरुणाद्यावाहितदेवताः प्रीयन्तां न मम।’

फिर नवग्रहों का पूजन कीजिए। हाथ में अक्षत और पुष्प ले लीजिए और निम्न मंत्र से नवग्रहों का आह्वान करके उनकी पूजा करें :

अस्मिन नवग्रहमंडले आवाहिताः सूर्यादिनवग्रहा देवाः सुप्रतिष्ठिता वरदा भवन्तु ।

अब हाथ जोड़कर प्रार्थना करें~

ॐ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसतो बुधश्च गुरुश्च शुक्रः शनि राहुकेतवः सर्वेग्रहाः शांतिकरा भवन्तु ॥

सूर्यः शौर्यमथेन्दुरुच्चपदवीं सन्मंगलं मंगलः सद्बुद्धिं च बुधो गुरुश्च गुरुतां शुक्र सुखं शं शनिः ।

राहुर्बाहुबलं करोतु सततं केतुः कुलस्यो नतिं
नित्यं प्रीतिकरा भवन्तु मम ते सर्वेऽनकूला ग्रहाः ॥

इसके बाद भगवती षोडश मातृकाओं का पूजन किया जाता है।
षोडश मातृका

गौरी पद्मा शची मेधा, सावित्री विजया जया ।
देवसेना स्वधा स्वाहा, मातरो लोकमातरः॥
धृतिः पुष्टिस्तथा तुष्टिः, आत्मनः कुलदेवता ।
गणेशेनाधिका ह्येता, वृद्धौ पूज्याश्च षोडश॥
हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प ले लीजिए। 16 माताओं को नमस्कार कर लीजिए और पूजा सामग्री चढ़ा दीजिए।

मातृकाओं की पूजा के बाद रक्षाबंधन होता है। रक्षाबंधन विधि में मौलि लेकर भगवान गणपति पर चढ़ाइए और फिर अपने हाथ में बंधवा लीजिए और तिलक लगा लीजिए।

अब आनंदचित्त से निर्भय होकर महालक्ष्मी की पूजा प्रारंभ कीजिए।

लक्ष्मी पूजन
सबसे पहले माता लक्ष्मी का ध्यान करेंः –
ॐ या सा पद्मासनस्था, विपुल-कटि-तटी, पद्म-दलायताक्षी।
गम्भीरावर्त-नाभिः, स्तन-भर-नमिता, शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया।।
लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। ज-खचितैः, स्नापिता हेम-कुम्भैः। नित्यं सा पद्म-हस्ता, मम वसतु गृहे, सर्व-मांगल्य-युक्ता।।

अब हाथ में अक्षत लेकर बोलें.. “ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मी, इहागच्छ इह तिष्ठ, एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।”

प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराएं..
ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः।।
इदं रक्त चंदनम् लेपनम् से रक्त चंदन लगाएं।
इदं सिन्दूराभरणं से सिन्दूर लगाएं।
‘ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, कमलायै नमो नमः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।’

इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं।
अब लक्ष्मी देवी को इदं रक्त वस्त्र समर्पयामि कहकर लाल वस्त्र पहनाएं।

देवी लक्ष्मी की अंग पूजा..
बाएं हाथ में अक्षत लेकर दाएं हाथ से थोड़ा-थोड़ा अक्षत छोड़ते जाएं—
ॐ चपलायै नम: पादौ पूजयामि
ॐ चंचलायै नम: जानूं पूजयामि,
ॐ कमलायै नम: कटि पूजयामि,
ॐ कात्यायिन्यै नम: नाभि पूजयामि,
ॐ जगन्मातरे नम: जठरं पूजयामि,
ॐ विश्ववल्लभायै नम: वक्षस्थल पूजयामि,
ॐ कमलवासिन्यै नम: भुजौ पूजयामि,
ॐ कमल पत्राक्ष्य नम: नेत्रत्रयं पूजयामि,
ॐ श्रियै नम: शिरं: पूजयामि।

अष्टसिद्धि पूजन मंत्र और विधि..

अंग पूजन की भांति हाथ में अक्षत लेकर मंत्र बोलें।
ॐ अणिम्ने नम:,
ॐ महिम्ने नम:,
ॐ गरिम्णे नम:,
ॐ लघिम्ने नम:,
ॐ प्राप्त्यै नम:
ॐ प्राकाम्यै नम:
ॐ ईशितायै नम:
ॐ वशितायै नम:

अष्टलक्ष्मी पूजन मंत्र और विधि..

अंग पूजन एवं अष्टसिद्धि पूजा की भांति हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें..
ॐ आद्ये लक्ष्म्यै नम:,
ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम:,
ॐ सौभाग्य लक्ष्म्यै नम:,
ॐ अमृत लक्ष्म्यै नम:,
ॐ धन लक्ष्म्यै नम:,
ॐ सत्य लक्ष्म्यै नम:,
ॐ भोगलक्ष्म्यै नम:,
ॐ योग लक्ष्म्यै नम:

प्रसाद अर्पित करने का मंत्र..

“इदं नानाविधि नैवेद्यानि ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें।
मिठाई अर्पित करने के लिए मंत्र..
“इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” बोलें।
प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें।
इदं आचमनयं ॐ महालक्ष्मियै नम:
इसके बाद पान सुपारी चढ़ाएं..
इदं ताम्बूल पुंगीफल समायुक्तं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि

अब एक फूल लेकर लक्ष्मी देवी पर चढ़ाएं और बोलें…

एष: पुष्पान्जलि ॐ महालक्ष्मियै नम:

दीपक पूजन

दीपक जीवन से अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर जीवन में ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है। दीपावली के दिन पारिवारिक परंपराओं के अनुसार तिल के तेल के सात, ग्यारह, इक्कीस अथवा इनसे अधिक दीपक प्रज्वलित करके एक थाली में रखकर कर पूजन करने का विधान है।

उपरोक्त पूजन के पश्चात घर की महिलाएं अपने हाथ से सोने-चांदी के आभूषण इत्यादि सुहाग की संपूर्ण सामग्रियां लेकर मां लक्ष्मी को अर्पित कर दें। अगले दिन स्नान इत्यादि के पश्चात विधि-विधान से पूजन के बाद आभूषण एवं सुहाग की सामग्री को मां लक्ष्मी का प्रसाद समझकर स्वयं प्रयोग करें। ऐसा करने से मां लक्ष्मी की कृपा सदा बनी रहती है।

अब श्रीसूक्त व कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें।

पूजा के दौरान हुई किसी ज्ञात-अज्ञात भूल के लिए श्रीलक्ष्मी से क्षमा-प्रार्थना करें।

न मैं आह्वान करना जानता हूँ, न विसर्जन करना। पूजा-कर्म भी मैं नहीं जानता। हे परमेश्वरि! मुझे क्षमा करो। मन्त्र, क्रिया और भक्ति से रहित जो कुछ पूजा मैंने की है, हे देवि! वह मेरी पूजा सम्पूर्ण हो।
यथा-सम्भव प्राप्त उपचार-वस्तुओं से मैंने जो यह पूजन किया है, उससे भगवती श्रीलक्ष्मी प्रसन्न हों।

भगवती श्री गणेश जी व महालक्ष्मी जी को यह सब पूजन समर्पित है, कहकर आरती करें~

श्री गणेश जी कीआरती
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।।

लक्ष्मी जी की आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता मैया जय लक्ष्मी माता
तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता..

आरती के बाद पुष्पांजलि दे।

पूजा के बाद अज्ञानतावश पूजा में कुछ कमी रह जाने या गलतियों के लिये देव शक्तियों के सामने हाथ जोड़कर निम्नलिखित मंत्र का जप करते हुए क्षमा याचना करें।

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरं l
यत पूजितं मया देव, परिपूर्ण तदस्त्वैमेव l
आवाहनं न जानामि, न जानामि विसर्जनं l
पूजा चैव न जानामि, क्षमस्व परमेश्वरं l

 

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