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दशहरा : या देवी सर्वभूतेषु …

देवी की पूजा भी, देवी का अपमान भी, क्यों ?

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भारतीय संस्कृति के तमाम पर्वों की यही खूबसूरती है कि वह अपने उत्सवों के माध्यम बड़ा सामाजिक सन्देश देते रहे हैं. आप कोई भी पर्व देख लीजिए होली, दिवाली, रक्षाबंधन या फिर नवरात्रि, आपको हर पर्व के पीछे मजबूत सामाजिक सन्देश नज़र आएगा. इस क्रम में, नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है, बहुत लोग नवरात्रि में नौ दिन, नौ देवी की आराधना, व्रत और उपवास करते हैं. नवमी के दिन नौ देवियों के प्रतीक स्वरुप नौ कन्याओं की पूजा की जाती है. ये नौ देवियां हैं:
शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री.

इस सम्बन्ध में तमाम पौराणिक कथाएं विद्यमान हैं एवं वर्तमान में भी नवरात्रि की प्रसांगिकता यथावत बनी हुई है. माँ दुर्गा पार्वती का ही दूसरा नाम है, जिनकी उत्पत्ति राक्षसों यानि आसुरी प्रवृत्ति का नाश करने के लिये देवताओं की प्रार्थना पर देवी पार्वती की इच्छा से हुआ था. हिन्दुओं के शाक्त साम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च स्थान दिया गया है. उपनिषदों में देवी “उमा हैमवती” (उमा, हिमालय की पुत्री) का वर्णन है तो पुराण में दुर्गा को आदिशक्ति माना गया है. युद्ध की देवी दुर्गा के स्वयं कई रूप हैं, जिनकी नवरात्रों के दौरान पूजा आराधना की जाती है. देवी का मुख्य रूप “गौरी” है, अर्थात शान्तमय, सुन्दर और गौरवर्णीय. इसी क्रम में, उनका सबसे भयावह रुप काली है, अर्थात श्यामवर्णीय, जिसे देखने मात्र से ही भय की उत्पत्ति होती है, किन्तु यह भय उनके भक्तों के लिए नहीं बल्कि दुष्ट आसुरी शक्तियों के लिए है.

देखा जाए तो नवरात्री का महत्त्व सामाजिक रूप से इन देवियों के पूजन से नारी शक्ति का अहसास कराता है तो भटके हुए पथिकों को इस बात का बोध भी कराता है कि अगर इस संसार में नारी शक्ति नहीं तो कुछ भी नहीं! हालाँकि, हमारे समाज में भ्रूण हत्या, बलात्कार जैसे कुकृत्य से लेकर दहेज़ हत्या तक अनेक ऐसे नारी उत्पीड़न के अपराध सामने हैं, जिनका ज़िक्र करते हुए भी आत्मग्लानि के साथ आक्रोश का बोध होता है. इन बुराइयों पर खूब चर्चाएं होती है तो कई आंदोलन भी चले हैं. देश को झकझोर देने वाला साल 2012 के निर्भया मामले के बाद देश की बेटियों को निडर रहने की बात हुई थी लेकिन हमारे समाज का एक कुरुप चेहरा ये भी है कि अपनों के हाथों से भी नारी शिकार होती है. हलांकि कुछ सुधार जरूर हुआ है, किन्तु आज भी हम नारी सम्मान के लक्ष्य से कोसों दूर नज़र आते हैं. अगर देवियों के पूजन के बहाने ही सही, हमारा समाज कन्याओं की सृष्टि रचना में भूमिका स्वीकार करते हुए उन्हें सम्मान देता है, उनके अधिकारों की रक्षा करता है तो नवरात्रि का एक बड़ा उद्देश्य हल हो जायेगा. इस बात से भी हमें सबक लेना होगा कि अगर नारी शक्ति माँ कालरात्रि की तरह हमारी आसुरी प्रवृत्ति से हम पर कुपित हो जाए तो क्या हम अन्धकार में नहीं चले जायेंगे? यही तो सोचना है हमें और यही भारतीय दर्शन और नवरात्रि जैसे संस्कारों का मूल भी है.

बहुत जरूरी है जागने की, अपने अंदर की आसुरी प्रवृत्ति को दहन करने की, चरमराती आस्थाओं को सुदृढ़ बनाने की. नयी सोच के साथ नये रास्तों पर फिर एक-बार उस सफर की शुरूआत करें जिसकी गतिशीलता जीवन-मूल्यों को फौलादी सुरक्षा दे सके. यही सच और संवेदना की संपत्ति ही मानव की अपनी थाती होती है. इसी संवेदना और सच से उपजे अर्थ जीवन को सार्थक आयाम देते हैं. मूल्यों के गिरने और आस्थाओं के विखंडित होने से उपजी मानसिकता ने आदमी को निराशा के धुंधलकों में धकेला है. दशहरा या विजयादशमी जैसे पर्व ही हमें नयी प्रेरणा देते हैं जिससे व्यक्ति इन निराशा के धुंधलकों से बाहर निकलकर जीवन के क्षितिज पर पुरुषार्थ के नये सूरज उगा सके।

संपादकीय- डॉ. हेमलता एस मोहन
शिक्षाविद् एवं संस्कृति संवाहक

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