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डॉ.अजय कुमार: “कांग्रेसी नेता को भाजपा से कुछ संस्कार सीखना चाहिए”, नाराज़गी या BJP में जाने का इशारा

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कांग्रेस पार्टी को रह-रह कर हर तरफ से राजनीतिक झटके लग रहे हैं. कांग्रेस के नेता भाजपा में शामिल हो रहे हैं. पचास दिन से ज्यादा हो गए पार्टी को अभी तक अपना प्रमुख नहीं मिला है. राष्ट्रीय स्तर पर इस्तीफे के दौर के बाद अब राज्य स्तर पर भी विद्रोह से स्वर तेज़ होते नज़र आ रहे हैं.

झारखंड प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने बगावती सुर छेड़ दिया है, उन्होंने कहा कि कुछ लोग पार्टी के अंदर ही नफरत की राजनीति करते हैं. बाहरी भीतरी की बात करते हैं. 20 साल से ज्यादा हो गए मैं राज्य की सेवा कर रहा हूं. झारखंड नौकरी करने आया था और यहीं से अपना रिश्ता जोड़े रखा. ऐसे में सालों से रह रहे लोग आज बाहरी हो गए.

उन्होंने आगे कहा कि ऐसे नेताओं को भाजपा से कुछ संस्कार सीखना चाहिए. हालांकि उन्होंने ये सब कहते हुए किसी का नाम नहीं लिया लेकिन यह समझा जा सकता है कि उनका इशारा सुबोधकांत सहाय के तरफ था.

साथ ही साथ उन्होंने यह भी कहा कि, झारखंड के मुख्यमंत्री के कितने भी विरोधी क्यों न हो, लेकिन उनके पार्टी का कोई उन्हें बाहरी नहीं कहता. विरोधियों को भी भाजपा के अच्छी संस्कृति से कुछ सीखना चाहिए.

डॉ.अजय यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने यह भी कह दिया कि ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण और नफरत फ़ैलाने वाले बयान से ही आदमी का चरित्र सामने आ जाता है.

डॉ. अजय का कहना है कि, अगर किसी को कुछ कहना भी है, तो उनके काम को लेकर कहे, उनके कार्यों की आलोचना करे लेकिन लोग बाहरी और भीतरी के चक्कर में पड़े हुए हैं.

उन्होंने तो साफ़ तौर पर कह दिया कि ऐसे झारखंडी होने से क्या फायदा जो सबको साथ लेकर चलना नहीं जानता हो.

मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को नज़र में रखते हुए देखें तो इस बयान के दो पहलु हो सकते हैं. एक तो यह कि उन्हें बाहरी कहना रास नहीं आया और बात बहुत बुरी लगी इसलिए गुस्सा में इतना कुछ बोल गए.

दूसरा पहलु यह हो सकता है कि, देश के राजनीति में फिलहाल पलायन का दौर चल रहा है. कांग्रेसी नेता कांग्रेस का हाथ छोड़ कमल खिलाने में लग गए हैं. तो क्या डॉ. अजय कुमार के इस बयान से हम समझें कि वो भी बाकियों के तरह अब भाजपा में शामिल होना चाहते हैं और यह बयान उसी बात का एक इशारा था, या फिर ये बातें सिर्फ उनकी भावनाएं थी.

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