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Jharkhand: ऑटो-सहायक इकाइयों से निकाले गए लोग दिहाड़ी मज़दूरी करने को मजबूर

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सुबह के 9 बजे जमशेदपुर के इमली चौक में करीब 200 दिहाड़ी मज़दूर अपने-अपने रोजगार के इंतज़ार में खड़े नज़र आते हैं. वो इंतज़ार में रहते हैं कि कोई ठेकेदार आएगा और उन्हें 1 दिन के काम के लिए लेकर जायेगा.

इमली चौक में रोजगार के इंतज़ार में खड़े मज़दूरों की संख्या जितनी ज्यादा है काम की संख्या उतनी ही कम.

महज़ तीन महीने पहले जमशेदपुर के इमली चौक का ये आलम न था. यहां दिहाड़ी मज़दूरों का जमघट नहीं लगा करता था.

इमली चौक पर मजदूरों की संख्या बढ़ने की वजह क्या है ?

जमशेदपुर के आस पास के इलाके जैसे, सरायकेला और राजनगर जैसी जगहों पर, जो ऑटो-सहायक इकाइयों में काम किया करते थे, उनकी नौकरी चले जाने की वजह से वो दैनिक मजदूरों की भीड़ में शामिल हो गए हैं.

पिछले कुछ महीनों में ऑटोमोबाइल उद्योग में खासी गिरावट आयी है. ऑटोमोबाइल उद्योग ने अपना उत्पादन कम कर दिया है जिसके वजह से उन्हें कम वर्करों कि ज़रुरत है और इस कारण बहुत से लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया है.

आपको बता दें कि, जमशेदपुर टाटा स्टील और टाटा मोटर्स का घर है, जो इस क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण योगदान देता है.

साथ ही आप यह भी जान लीजिये कि राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दस का जन्मस्थल भी जमशेदपुर ही है.

उसी भीड़ में खड़े एक मज़दूर ने कहा कि, मुख्यमंत्री जी के ही शहर में नौकरी से निकाले हुए लोग एक दिन की मज़दूरी को तरस रहे हैं, लेकिन मुख्यमंत्री साहेब को है कि दिखबे नहीं करता है.

बता दें कि, प्रमुख ऑटोमोबाइल निर्माताओं ने जुलाई में अपनी घरेलू बिक्री में 50 प्रतिशत तक की गिरावट की जानकारी दी है, वहीँ मारुति सुजुकी ने बिक्री में 36.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की है.

इस तरह के प्लांट ग्रामीण क्षेत्रों के मजदूरों को अवसर प्रदान करते हैं. राज्य में खेती भी एक स्थायी विकल्प नहीं है और यहां तक ​​कि मनरेगा के तहत प्रति दिन 171 रुपये मजदूरों दिया जाना भी पर्याप्त नहीं है. कई बार तो योजना के तहत काम करने वाले मज़दूरों को देर से भुगतान किया जाता है जिससे उन्हें ठीक तरीके से दिन काटने में भी दिक्कत आती है.

जमशेदपुर में टाटा मोटर्स भारी वाहनों का निर्माण करती है, और लगभग 10,000 श्रमिकों को काम पर रखती है, जिनमें से लगभग आधे कॉन्ट्रैक्ट पर हैं. उद्योग के सूत्रों के अनुसार, कंपनी ने 10,000-12,000 इकाइयों से मासिक उत्पादन में लगभग 2,500-3,000 इकाइयों की कटौती की है.

राजू कुमार नाम के एक व्यक्ति ने बताया कि, वो बेहतर आजीविका की तलाश में औरंगाबाद, बिहार से जमशेदपुर आया और पिछले दो वर्षों से फोर्जिंग यूनिट में काम किया, 12 घंटे की शिफ्ट में 450 रुपये मिलते थे,लेकिन आज ” अगर मुझे प्रतिदिन 250 रुपये भी मिलेंगे तो मुझे खुशी होगी.”

गौरतलब है कि, उद्योग निकाय FADA के अनुसार, भारत में ऑटोमोबाइल रिटेलरशिप में पिछले तीन महीनों में लगभग दो लाख नौकरियों में कटौती की गई है.

वहीं आने वाले वक़्त में, देश के ऑटोमोबाइल सेक्टर में भारी संख्या में नौकरियां घटने वाली है. करीब 10 लाख लोगों का रोज़गार छिना जा सकता है. पिछले 11 महीने से ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री के विकास में कमी की वजह से यह स्थिति बनी है.

ऑटोमेटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोशियन ऑफ इंडिया यानि एसीएमए के महाप्रबंधक विन्नी मेहता ने द हिंदू बिजनेस लाइन को बताया है, “हर कंपनी में कम से कम 10 से 15 प्रतिशत लोगों को रोज़गार का नुक़सान हो रहा है. पूरा हरियाणा इस मंदी को झेल रहा है. ऑटो कम्पोनेंट इंडस्ट्री में करीब 50 लाख कर्मचारी काम करते हैं और इसमें से 70 प्रतिशत कर्मचारी ठेके पर हैं.”

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