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लोकतंत्र के लिए खिड़कियों को खुला रखें

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पीएम नरेंद्र मोदी ने लोकसभा के चुनावों में 2014 के बाद अब 2019 में लगातार जबरदस्त जीत दर्ज कर भारत में केंद्रीय नेतृत्व के राजनीतिक दमखम से देश को भरोसा दिलाने में कामयाबी पायी है।

उन्होंने दोबारा जीत दिखाते चुनावी नतीजे के बाद पर ट्वीट किया और फिर वही नैरा दिया- ‘सबका साथ, सबका विकास’। मोदी के ‘विकास पुरुष’ का यह फलसफा भारत और इसके आस-पास के देशों में ही नहीं, बल्कि विश्व पटल पर एक बार फिर छाप छोड़ने वाला है। अब फिर एक बार भारत की अनवरत विकास-यात्रा आगे बढ़ने जा रही है, लेकिन मोदी ने एक मंझे राष्ट्रीय नेता की जो छाप भारत के हजारों किलोमीटर में बसे शहरों, कस्बों और लाखों गांव पर छोड़ी है,

सबका  साथ सबका विकास

इस चर्चित नारे को खुद मोदी ने ही एक बार फिर से इस महान राष्ट्र के साथ साझा करने में देरी नहीं की। बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियों ने स्वच्छ राजनीति और शासन-प्रशासन देने में भी वैसी इच्छा-शक्ति का परिचय दिया, उसे जवाबदेह बनाने की जो कोशिश दिखाई और पिछले पांच बरसों में मोदी एंड कंपनी ने देश का विकास करने में जो ईमानदारी दिखाई, साथ ही लगातार इसी सोच को देश के सामने रखा, उसे भारत की जनता सम्मान की नजरों से भी दिखती रही। 2014 में केंद्र में सत्तासीन हुई बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियां मोदी के कार्यों और स्वभाव से रह-रहकर परिचित होती रहीं, लेकिन विश्वसनीय आधार तब आकर लेता दिखा, जब एक स्थाई विकल्प के रूप में बीजेपी और उसके शिखर पुरुष नरेंद्र मोदी में वही तेवर और कलेवर हर समय देखने को मिलता रहा।
इधर के कई बरसों में हम भारतीयों ने देखा कि किस तरह से कांग्रेस और अन्य दलों की समझदारी संदेह से परे नहीं थी। वे पूरी समझदारी और जानबूझकर अपनी राजनीतिक पैंतरेबाजी से कभी बाज नहीं आते दिखे, साथ ही देशवासियों के सामने लाचार हालात पैदा किये गये, उसी का नतीजा 2019 के इस चुनावी नतीजे में देखने को मिला भी है। हम जब केंद्रीय सत्ता के संचालन के तौर-तरीके पर गौर करते हैं, तो एक एहसास दिल में रहता है कि शासन में बैठे हुए लोगों से ईमानदारी और हर समय ईमानदारी की उम्मीदें मुरझाएंगी नहीं। इस सोच को लोकतंत्र में नकारा भी नहीं जा सकता।
आज कांग्रेस के विजयी सांसदों का ग्राफ बेहद निचले पायदान पर सिमट गया है, तो यहां खुद कांग्रेस को सच्चाई समझने की जरूरत तो है ही और होनी भी चाहिए। आखिरी नतीजे आ जाने के साथ ही अब चुनावी हलचल थम गयी है, लेकिन नतीजों के आईने से देखें, तो कांग्रेस सहित सभी गैर बीजेपी पार्टियों को खुद में झाँकने की जरूरत है कि लोकतंत्र कभी लाचार नहीं होगा और इसे लाचार समझने की किसी को भूल भी नहीं करनी चाहिए। सभी दलों को यह भी सोचने की जरूरत है कि हम तभी खुश रहेंगे, जब भारतीय लोकतंत्र सच्चे मायने में झलकता रहे और इस भावना में एक गरीब को शासन-प्रशासन की ओर से किसी तरह की टीस न मिले, बल्कि रोज की जिंदगी में उसे कानून के शासन और प्रशासन की ओर से सुरक्षा भी मिले। वैसे भी भारत अपने इस लोकतंत्र को सहेजने की कला बखूबी जानता है और यह मानता भी है कि इस लोकतंत्र के सारे खम्भे अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में कोई कोताही नहीं उठा रहेंगे। तभी हमारा तिरंगा भी फहरने में गर्व का अनुभव करेगा और इस अनुभव को लोकतंत्र के सर्वोच्च भवन यानी संसद की जिंदादिली के रास्ते से ही आगे बढ़ते रहना है। इसलिए वोट देने के दौरान जिस भावना या मकसद को आगे रखकर हम और आप घरों से निकले थे, वह अब आकार ले चुका है। इसलिए आइये, ताज़ी हवा आने देने के लिए खिड़कियों को खुला रखें, जिससे अच्छी भावना से विचारों को गले लगाए रखा जा सके।

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