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मदर टेरेसा के 109 वीं जयंती पर जानिए उनके खास सफर के बारे में

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दुनिया में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जो शांति की दूत और मानवता की प्रतिमूर्ति कहे जाने वाली मदर टेरेसा को नहीं जानता हो. भारत में गरीब और पीड़ित परिवार की सेवा करने वाली मदर टेरेसा की आज 109 वीं जयंती है.

मदर टेरेसा का सफर

 

यूगोस्लाविया के स्कॉप्जे में मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को हुआ था. इनका असली नाम एग्नेस गोंझा बोयाजिजू था बाद में यह मदर टेरेसा बनीं.

 

मदर टेरेसा कैथोलिक थीं, लेकिन उन्हें भारत की नागरिकता मिली हुई थी. वह भारत में गरीब और पीड़ित लोगों की मदद करती थी. गरीबों की मदद करते करते उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी. जिसके लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है.

 

18 वर्ष की उम्र में वह लोरेटो सिस्टर्स में ज्ञान प्राप्त कर सिस्टर टेरेसा बनीं थी. जिसके बाद वह भारत आयी और यहां आकर ईसाईयों के साथ कार्यों में जुड़ गयी.

 

देश में इतनी ज्यादा गरीबी और पीड़ितों को उनसे देखा नहीं गया. इसलिए उन्होंने झुग्गी- झोपड़ियों में जाकर पीड़ितों की मदद करना शुरू कर दिया.

 

मदर टेरेसा के अच्छे कामों का सफलता मिलने लगी और काम इतना बढ़ता गया कि सन 1996 तक उनकी संस्था ने करीब 125 देशों में 755 आश्रम गृह खोले. जिससे लगभग 5 लाख लोगों की भूख मिटने लगी.

 

उन्होंने ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की. मदर टेरेसा द्वारा स्थापित की गयी यह संस्था आज 123 मुल्कों में है, जिसमे 4,500 से ज्यादा सिस्टर हैं.

 

वह सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विदेश में भी अपने मानवता के कार्यों के लिए जानी जाती हैं.

 

एक तरफ जहां कुछ लोगों ने मदर टेरेसा के अच्छे कार्यों की सराहना की वहीं दूसरी ओर उनकी मानवता पर धर्म परिवर्तन के आरोप लगाए गए कि यह लोगों का धर्म बदलवाकर उन्हें ईसाई बनाना चाहती है.

 

मदर टेरेसा अपनी मृत्यु तक कोलकाता में ही रहीं और गरीबों के लिए कार्य करती रही, लेकिन लगातार गिरती सेहत की वजह से 5 सितंबर 1997 को उनकी मौत हो गई.

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