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शायद मोदी का मतलब Meditet होगा लेकिन ट्रम्प ने Mediate सुना हो : सलमान खुर्शीद

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बीते कुछ दिनों से कश्मीर मध्यस्ता को लेकर अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और भारतीय प्रधानमंत्री मोदी चर्चा में हैं. इसी मुद्दे पर वरिष्ठ कांग्रेस ने नेता ने कहा कि हो सकता है मोदी मेडिटेट यानि धयान लगाना कह रहे हों और ट्रम्प मेडिएट यानि मध्यस्ता सुनाई पड़ा हो.

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से बात करते वक़्त ट्रम्प ने कहा था कि भारत ने यानि प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्ता के लिया कहा है. बस इस बयान के बाद तो मनो बवाल हो गया.

गौरतलब है कि भारत ने ट्रम्प की कही गयी बात से साफ़ तौर पर इंकार कर दिया है. मतलब भारत का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसी कोई बात अमरीकी राष्ट्रपति से नहीं बोली है.

चलिए वापस से चलते हैं सलमान खुर्शीद पर, खुर्शीद ने यह बयान गुरुवार को अपनी किताब “विजिबल मुस्लिम, इनविजिबल सिटिजन: अंडरस्टैंडिंग इस्लाम इन इंडियन डेमोक्रेसी” के लॉन्च पर दिया.

सलमान ने हलके फुल्के मूड से कहा कि हो सकता है मोदी मेडिटेट इन योग यानि कि योग में ध्यान लगाने को कह रहे हों लेकिन ट्रम्प को मेडिएट इन कश्मीर यानि कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्ता सुनाई पड़ा हो.

“साथी ही उन्होंने कहा कि, हो सकता है कि यह कम्युनिकेशन की समस्या हो, लेकिन कूटनीति में सब कुछ संचार पर ही निर्भर करता है. अगर आप संचार में अच्छे नहीं हैं तो फिर किस तरह कूटनीति है आपके पास.”

कांग्रेस नेता ने राजनयिक के रूप में ट्रैक रिकॉर्ड का हवाला देते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर की तारीफ की.

उन्होंने कहा, ” उनके पास बहुत ही शानदार रिकॉर्ड है और हमारे पास एक ऐसा उज्ज्वल विदेश मंत्री है, जिसने अपने पीछे (विदेश सचिव के रूप में) उल्लेखनीय विरासत छोड़ी है. खुर्शीद ने कहा, लेकिन मैं उसके लिए केवल खेद व्यक्त कर सकता हूं.”

किताब के विमोचन के बाद एक बातचीत के दौरान, खुर्शीद ने समकालीन भारत में मुस्लिम होने का मतलब क्या है, के बारे में सवाल उठाए.

“मुसलमान धीरे-धीरे पब्लिक डिस्कोर्स से गायब हो रहे हैं और हमें यह समझने की आवश्यकता है कि ऐसा क्यों हो रहा है,” उन्होंने कहा.

कांग्रेस नेता ने कहा, “वे उदारवादी दलों में शरण ले सकते हैं, लेकिन उदारवादी दलों को भी यह साबित करने की जरूरत है कि वे वास्तव में उदारवादी हैं।”

खुर्शीद ने कहा कि इस्लाम की आधुनिक व्याख्या की पेशकश करने के लिए धार्मिक और राजनीतिक नेताओं को हाथ मिलाना चाहिए, जैसा कि अतीत में कवि अल्लामा इकबाल ने किया था.

उन्होंने यह भी कहा कि, बहुत सारे गैर-मुस्लिम हैं “जो हमेशा मुसलमानों के पीछे खड़े रहे हैं और उनका समर्थन किया है”, और अधिकांश हिंदू और मुस्लिम संविधान में विश्वास करते हैं.

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