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NMC विधेयक के विरोध में दिल्ली में रेजीडेंट चिकित्सकों ने किया हड़ताल

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New Delhi: भारत की राजधानी में मरीजों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. कई अस्पतालों में रेजिडेंट डॉक्टर चिकित्सा शिक्षा क्षेत्र का नियमन करने वाले महत्वपूर्ण विधेयक के विरोध में हड़ताल पर हैं और उन्होंने आपात विभाग(emergency dept.) समेत सभी सेवाएं रोक दीं हैं.

AIMS, RMLअस्पताल, सफदरजंग अस्पताल और LNJP समेत कई सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों ने काम का बहिष्कार किया, मार्च निकाला और राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) विधेयक के विरोध में नारे लगाए.

 

आपको बता दें कि, यह विधेयक अभी राज्यसभा में पेश किया गया है.

विरोध अनिश्चितकाल के लिए जारी रखेंगे.

उन्होंने कहा कि, यदि विधेयक राज्यसभा में पारित हो जाता है तो वे OPD, आपात विभाग, ICU और ऑपरेशन थियेटरों में काम को रोक देंगे और अपना विरोध अनिश्चितकाल के लिए जारी रखेंगे.

NMC भ्रष्टाचार के आरोप झेल रही भारतीय चिकित्सा परिषद (MCI) की जगह लेगा. यह विधेयक 29 जुलाई को लोकसभा में पारित हुआ था.

पुलिस ने उन्हें संसद की ओर मार्च करने से रोक दिया

AIMS और सफदरजंग अस्पतालों के रेजीडेंट डॉक्टरों और स्नातक की पढ़ाई कर रहे छात्रों के विरोध प्रदर्शनों के कारण गुरुवार सुबह रिंग रोड पर यातायात बाधित हो गया. पुलिस ने उन्हें संसद की ओर मार्च करने से रोक दिया.

पुलिस ने बताया कि प्रदर्शन कर रहे डॉक्टरों को हिरासत में ले लिया गया और उनमें से कुछ को बाद में रिहा कर दिया गया.

संसद के आसपास के इलाकों में पुलिस बल की भारी तैनाती देखी गई. संसद के आसपास की सड़कों पर बैरिकेड लगाए गए, इलाके में यातायात की गति भी धीमी रही.

फेडरेशन ऑफ रेजीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (फोर्डा) से जुड़े डॉक्टरों के एक अन्य समूह ने RML अस्पताल से संसद तक मार्च करने की योजना बनाई थी. फोर्डा के महासचिव डॉ. सुनील अरोड़ा ने दावा किया कि डॉक्टरों को संसद की ओर जाने से रोक दिया गया.

मरीजों को हड़ताल के बारे में जानकारी नहीं थी जिसके कारण वे घर लौट गए और कुछ ने काफी समय तक इंतजार किया.

लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल, बी आर अंबेडकर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल, डीडीयू अस्तपाल तथा संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल के रेजीडेंट डॉक्टरों ने भी काम का बहिष्कार किया और हड़ताल में शामिल हो गए.

दिल्ली सरकार के सबसे बड़े अस्पताल एलएनजेपी में ओपीडी बंद रही और आपात विभाग में भी बहुत कम मरीज देखे गए.

 

LNJP के चिकित्सा अधीक्षक किशोर सिंह ने कहा,

‘‘हमारे यहां OPD में हर दिन 9,000 मरीज आते हैं और करीब 900 मरीज ईआर विभाग में आते हैं. आज ओपीडी बंद रहने के कारण कई मरीजों को लौटना पड़ा जिनमें से बड़ी संख्या में मरीज शहर से बाहर से आए हुए थे. ईआर विभाग में अभी तक 300 मरीज आए हैं और हम अपने कॉलेज के चिकित्सा शिक्षा कर्मियों को बुला रहे हैं.’’

गाजियाबाद निवासी पंकज पांडेय अपनी जांच कराने के लिए आए थे लेकिन उन्हें घंटों इंतजार करना पड़ा और आखिरकार खाली हाथ घर लौटना पड़ा.

कई अस्पतालों में आपात विभाग और आईसीयू में फैकल्टी सदस्यों, प्रायोजित रेजीडेंट्स, पूल अधिकारी, अन्य चिकित्सा या सर्जिकल विभाग के डॉक्टरों को बुलाया गया जबकि ओपीडी, रेडियो-डायग्नोसिस और लैबोरेटरी डायग्नोसिस सेवाएं कई स्थानों पर बंद रहीं.

अधिकारियों ने बताया कि नियमित सर्जरी रद्द कर दी गईं और कई अस्पतालों में केवल आपात मामले ही देखे गए.

 

सफदरजंग अस्पताल में चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सुनील गुप्ता ने कहा,

‘‘हम आमतौर पर एक दिन में करीब 150-180 सर्जरी करते हैं। सभी नियमित सर्जरी रद्द की गई और केवल आपात मामले ही देखे गए.’’

हड़ताल का सबसे अधिक असर पड़ोसी शहरों से आए मरीजों पर पड़ा क्योंकि उन्हें इलाज के लिए काफी परेशानी झेलनी पड़ी या कर्मचारियों की कमी के कारण अस्पतालों की ओपीडी में घंटों इंतजार करना पड़ा.

अपने बीमार बेटे को डॉक्टर को दिखाना चाहती थीं

उत्तर प्रदेश निवासी 60 वर्षीय शशि देवी ने कहा कि, वह अपने बीमार बेटे और पति के साथ बुधवार को राष्ट्रीय राजधानी पहुंचीं और अपने बेटे को बृहस्पतिवार को एक डॉक्टर को दिखाना चाहती थीं लेकिन दिखा नहीं पाई और उन्हें बाद में आने के लिए कहा. उन्होंने कहा कि उन्हें मालूम नहीं कि वह दिल्ली में कहां रुकेंगी.

चिकित्सा जगत ने यह कहते हुए विधेयक का विरोध किया कि विधेयक ‘‘गरीब विरोधी, छात्र विरोधी और अलोकतांत्रिक’’ है.

भारतीय चिकित्सा संघ ने जताई आपत्ति

भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) ने भी विधेयक की कई धाराओं पर आपत्ति जताई है. आईएमए ने बुधवार को 24 घंटे के लिए गैर जरूरी सेवाओं को बंद करने का आह्वान किया था। उसने एक बयान में चेताया था कि अगर सरकार उनकी चिंताओं पर उदासीन रहती है तो वे अपना विरोध तेज करेंगे.

एम्स आरडीए, फोर्डा और यूनाइटेड आरडीए ने संयुक्त बयान में कहा था कि इस विधेयक के प्रावधान कठोर हैं.

समूचे देश में स्वास्थ्य सेवाओं को बाधित कर सकता है

बयान में कहा गया था कि, विधेयक को बिना संशोधन के राज्यसभा में रखा जाता है तो पूरे देश के डॉक्टर कड़े कदम उठाने के लिए मजबूर हो जाएंगे जो समूचे देश में स्वास्थ्य सेवाओं को बाधित कर सकता है. डॉक्टर अनिश्चितकालीन समय के लिए जरूरी और गैर जरूरी सेवाओं को बंद कर देंगे.

छात्रों को विधेयक के कई प्रावधानों पर आपत्ति है

देश के डॉक्टरों एवं चिकित्सा छात्रों को विधेयक के कई प्रावधानों पर आपत्ति है. आईएमए ने एनएमसी विधेयक की धारा 32(1), (2) और (3) को लेकर चिंता जताई है जिसमें एमबीबीएस डिग्री धारकों के अलावा गैर चिकित्सकीय लोगों या सामुदायिक स्वास्थ्य प्रदाताओं को लाइसेंस देने की बात की गई है.

इसके अलावा चिकित्सा छात्रों ने प्रस्तावित ‘नेक्स्ट’ परीक्षा का उसके मौजूदा प्रारूप में विरोध किया है. विधेयक की धारा 15(1) में छात्रों के प्रैक्टिस करने से पहले और स्नातकोत्तर चिकित्सकीय पाठ्यक्रमों में दाखिले आदि के लिए ‘नेक्स्ट’ की परीक्षा उत्तीर्ण करने का प्रस्ताव रखा गया है.

उन्होंने विधेयक की धारा 45 पर भी आपत्ति जताई है जिसमें उन्होंने दावा किया कि केंद्र सरकार के पास राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग के सुझावों के विरुद्ध फैसला लेने की शक्ति होगी.

 

(with PTI inputs)

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