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जानिए “शहंशाह-ए-ग़ज़ल” मेहदी हसन की जिंदगी के अनकहे किस्से.

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मेहदी हसन ने दुनिया के लाखों लोगों के एहसास को आवाज़ दी है. अहमद फ़राज़ साहेब के अल्फ़ाज़ ऊपर से मेहदी हसन साहेब की आवाज़ में रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ जब लोगों ने सुना तो मेहदी साहेब की आवाज़ सभी के दिल में उतर गयी.

राजस्थान के जयपुर से करीब 107 किलोमीटर दूर ‘लूना’ में 18 जुलाई 1927 को मेहदी हसन का जन्म हुआ.

किसी को खबर तक न थी कि 18 जुलाई 1927 को जन्म लेने वाला ये बच्चा आने वाले वक़्त में ग़ज़ल गायकी के इतिहास के सबसे महान और सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में से एक माना जाएगा और “ग़ज़ल का बादशाह” या “शहंशाह-ए-ग़ज़ल” बन जाएगा.

मेहदी हसन ने एक से बढ़ कर एक ग़ज़ल गायी, उनकी ग़ज़लों ने दुनिया भर के आशिक़ों व लोगों के दर्द और मुहब्बत को एक आवाज़ दे दी.

वो महज 6 साल के थे जब बकायदा उनकी मौसिकी की तालीम का आगाज हुआ.

मेहदी हसन ने अपने वालिद उस्ताद अज़ीम खान साहेब और चाचा उस्ताद इस्माइल खान साहेब से संगीत सीखा, मेहदी हसन के वालिद और चाचा दोनों पारंपरिक ध्रुपद गायक थे.

हसन ने बहुत ही कम उम्र में गाना शुरू कर दिया था.फजिल्का बुंगला में, अविभाजित पंजाब के डीसी हाउस (1935) के पास आयोजित कार्यक्रम में अपने बड़े भाई के साथ ध्रुपद और ख्याल के पहले संगीत कार्यक्रम में भाग लिया. उनके बड़े भाई पंडित गुलाम कादिर ने भी उन्हें बहुत प्रोत्साहित किया है.

जल्द ही उन्होंने ठुमरी, ख्याल और दादरा समेत कई रागों में महारत हासिल की. आखों में ख्वाब सजाए ये नौजावन कराची आ गया और काफी मशक्कत के बाद 1952 में पाकिस्तान रेडियो में नौकरी मिली गई. मेहदी हसन ठुमरी के गायक थे ठुमरी ने उन्हें एक नई पहचान दी.

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले, चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले, ये ग़ज़ल सुन कर लाखों ने अपने महबूबा को याद याद किया. इस ग़ज़ल ने रातोंरात मेहदी हसन शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया.यहीं से मेहदी हसन की फिल्मी जिंदगी की शुरुआत हुई. 60 और 70 के दशक की शायद ही ऐसी कोई बड़ी फिल्म हो, जिसमें मेंहदी हसन का गाना न हो.

80 के दशक के आखिर तक मेहदी हसन की मीठी आवाज सभी कानों में रस घोलती रही. फिर आहिस्ता-आहिस्ता वो बीमारियों की आगोश में आ गए और उन्हें फिल्मों की दुनिया से दूर होना पड़ा.

उसके बाद 13 जून को शहंशाह-ए-ग़ज़ल ने दुनिया को अलविदा कह गए लेकिन उनकी आवाज़ उनके गए ग़ज़लों ने हम सभी के दिल में मेहदी साहब को अब तक ज़िंदा रखा है.

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