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पूरे देश में हो रही डॉक्टरों की हड़ताल का मूल सच क्या है ? जानिए

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कोलकाता के मेडिकल कॉलेज में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई थी, जिसके चलते आज पूरे देश भर में डॉक्टर्स व्यापक हड़ताल पर है. अब सवाल ये उठता है कि, आखिर इतने व्यापक स्तर पर हड़ताल क्यों? क्या वजह थी कि, इतने संवेदनशील मुद्दे को प्रशासन और शासन दोनों ही नही सम्हाल पाए? क्या डॉक्टर्स और मरीज़ों के हित अलग अलग है ? गलती किसकी? लोगों की या डॉक्टर्स की? ये सारे ऐसे सवाल है जिनका जबाब जानना बेहद ज़रूरी है. क्योकि जो हो रहा है उसके चलते कई ज़िंदगियाँ दाओ पर लगी हुई है.

हुआ क्या था?

कोलकाता के मेडिकल कॉलेज में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई थी. जिसके चलते गुस्साए परिजनों ने डॉक्टर्स पर घातक हमला कर दिया था. जिसके कारण कई डॉक्टर्स गंभीर रूप से घायल हुए। इसी कारण डॉक्टर्स अपने लिए प्राथमिक सुरक्षा की मांग कर रहे है.

अगर गौर से देखें तो समझ आएगा कि डॉक्टर्स जो मांग कर रहे है वो उचित है. इस बात के खिलाफ कोई तर्क नहीं दिया जा सकता है कि, सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित करना बेहद ज़रूरी है तथा यह डॉक्टर्स का मौलिक अधिकार भी है. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, ने भी इस बात का समर्थन किया है तथा 17 जून को हड़ताल का आह्वान किया है। डॉक्टर्स की मांग है कि, हिंसा के दोषियों को आपराधिक कृत्यों के तहत बुक किया जाना चाहिए, हालांकि कई राज्यों में ऐसे नियम है लेकिन ये पर्याप्त नहीं है.

दूसरी ओर एक मुद्दा सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र की उपेक्षा का भी है. जिसके चलते सामाजिक विभाजन गहराता जा रहा है. आधारभूत संरचना की कमी है. सार्वजनिक अस्पतालों में रिक्त पदों को भरने के लिए राज्य सरकारों की अनिच्छा, और निजी क्षेत्र में चिकित्सा शिक्षा की बढ़ती उच्च लागत ने ऐसे संघर्षों को जन्म दिया है. इस बात को दो साल पहले नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया द्वारा डॉक्टरों ने रेखांकित भी किया गया था। डॉक्टरों और चिकित्सा पेशेवरों के खिलाफ हिंसा को समाप्त करने का प्रयास इस समझ के साथ शुरू होना चाहिए कि डॉक्टरों और रोगियों में एक विरोधी संबंध नहीं है, और प्रणालीगत कमियों के ज़रिये उप्तन्न हुई बाधाओं के लिए डॉक्टर्स ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. इन बाधाओं को दूर करना प्रशासन की ज़िम्मेदारी है.

कोलकाता मामले में, यह पता लगाया जाना चाहिए कि क्या जनशक्ति की कमी के कारण इलाज में देरी हुई, जैसा कि मरीज के परिजन कह रहे हैं। या पुलिस के बयान के तहत, संचार टूटने की स्थिति गड़बड़ा गई.

राजनितिक अड़ंगा

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने वार्ता को उचित मौका दिए बिना आंदोलनरत डॉक्टरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की। कई राज्यों के डॉक्टर्स ने इस कार्यवाही का विरोध किया। सुश्री बनर्जी के लिए यह आवश्यक है कि वे बात की गंभीरता को समझे और सेवाएं बहाल करें। आईएमए को भी एक ऐसे समाधान की ज़रूरत है, जो डॉक्टरों और रोगियों दोनों की चिंताओं को दूर कर सके. मरीजों को परामर्श देने के लिए बेहतर प्रणाली स्थापित करने और डॉक्टर्स की सुरक्षा के लिए संरचनात्मक परिवर्तन की जरूरत है।

एनडीए सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, जो स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय को जीडीपी के 2.5% तक बढ़ाती है, को बुनियादी ढाँचे को बढ़ाने और सरकारी अस्पतालों की क्षमताओं पर उतना ही ध्यान देना चाहिए, जितना कि महंगे निजी अस्पतालों में दिया जाता है।

ये सभी सार्वजनिक अस्पताल उन गरीबों की मदद के लिए है जो, दया और ज़िंदगी की तलाश में यहां आते हैं।

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