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भाजपा के इन नेताओं पर कभी CBI और ED छापेमारी क्यों नहीं करती

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जैसा कि पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम को INX मीडिया मामले में कथित भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया गया है, यह याद रखने योग्य है कि उस वक़्त चिदंबरम गृह मंत्री थे, जब जुलाई 2010 में सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले में अमित शाह को केंद्रीय जांच ब्यूरो ने गिरफ्तार किया था और आज अमित शाह गृह मंत्री हैं.

2014 से, नरेंद्र मोदी सरकार विपक्षी नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाती आ रही है. जब की एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने कहा कि “2014 तक जेल के दरवाजे पर लाया, अब 2019 के बाद जेल के अंदर लाऊँगा”.

चुनावी मौसम में विशेषकर छापे और सम्मन तेज हो जाते हैं. लेकिन यह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई नहीं है क्योंकि अगर यह होता, तो उन भाजपा नेता इससे अछूते न होते जिनपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं.

यहां कुछ राजनेता हैं जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियां ​​नरम स्वभाव हैं.

 

बी.एस. येदियुरप्पा: कर्नाटक में भ्रष्टाचार की छवि होने के बावजूद वह फिर से कर्नाटक के मुख्यमंत्री बन गए हैं. भूमि और खनन घोटालों में अभियुक्त, बरामद डायरी के साथ भाजपा के शीर्ष नेताओं, न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं को भारी मात्रा में भुगतान करते हुए दिखाया गया, लेकिन येदियुरप्पा आज ज्यादातर आरोपों से बरी हैं.

मोदी सरकार के सत्ता में आने पर वही सीबीआई जो सालों से उसकी जांच कर रही थी, उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर पायी. सर्वोच्च न्यायालय अभी तक एक भूमि घोटाले में उनके खिलाफ जांच का आदेश दे सकता है.

रेड्डी भाइयों: 2018 में कर्नाटक चुनावों से पहले, सीबीआई ने बेल्लारी बंधुओं के खिलाफ 16,500 करोड़ रुपये के खनन घोटाले में अपनी जांच का बहुत हड़बड़ी समापन किया, ताकि मामलों को उनके तार्किक छोर तक न पहुँचाया जा सके.

हिमंता बिस्वा शर्मा: हिमंत बिस्वा सरमा कभी कांग्रेस पार्टी के सदस्य थी और भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रही थी. गुवाहाटी में जल आपूर्ति घोटाले में सरमा पर “संदिग्ध” होने का आरोप लगाते हुए, भाजपा ने एक पूरा अभियान छेड़ दिया था, यहां तक ​​कि एक पुस्तिका भी जारी की गयी थी.

इस घोटाले को लुइस बर्जर मामले के रूप में जाना जाता है क्योंकि अमेरिकी निर्माण प्रबंधन कंपनी की इसमें भागीदारी है. अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा देश के विदेशी भ्रष्ट आचरण अधिनियम के तहत एक आरोप पत्र भी है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि कंपनी ने एक बेनाम मंत्री को रिश्वत दी थी. असम सरकार अनुमानित रूप से जांच पर धीमी हो गई है, और भाजपा ने सीबीआई को मामला सौंपने की अपनी पुरानी मांग को भी अधूरा छोड़ दिया है.

शिवराज सिंह चौहान: 2017 में सीबीआई ने तत्कालीन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को व्यापम घोटाले में क्लीन चिट दे दी. लेकिन मौजूदा एंटी-भ्रष्टाचार एंजेंडे को देखते हुए क्या शिवराज सिंह चौहान इस मामले से बाहर निकलते यदि वह कांग्रेस के सदस्य होते ?

एक बड़े प्रवेश परीक्षा घोटाला, घोटाले को उजागर करने वालों और गवाहों की रहस्यमय तरीके से मौत होती रही. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एक के बाद एक 40 से अधिक लोगों की मौत चुकी है जो इस मामले से जुड़े थे.

रमेश पोखरियाल निशंक: वह मानव संसाधन विकास मंत्री हैं. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में, वह दो बड़े घोटालों के केंद्र में थे: एक भूमि के बारे में और दूसरा जल विद्युत परियोजनाओं के बारे में. उनके शासन की छवि, जो विभिन्न भ्रष्टाचार के मामलों से प्रभावित थी, इतनी बुरी थी कि भाजपा ने उन्हें 2011 में इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया था.

भ्रष्टाचार के आरोपों की तह तक जाने के लिए न तो सीबीआई और न ही उत्तराखंड सरकार किसी तरह की जल्दबाजी कर रही है.

जांच की बात तो दूर, रमेश पोखरियाल अब प्रधानमंत्री मोदी के एक महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो में शामिल हैं

नारायण राणे: भाजपा ने पिछले साल महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे को पार्टी में शामिल किया और उन्हें राज्यसभा सांसद बनाया गया. सीबीआई और ईडी अब राणे की जांच करने या उनकी संपत्तियों पर छापेमारी करने में किसी तरह की जल्दबाजी में नज़र नहीं आ रहे हैं. राणे पर मनी लॉन्ड्रिंग और भूमि घोटाले का आरोप लगाया गया है.

इस ‘भ्रष्टाचार-विरोधी’ एजेंडे की चयनात्मक प्रकृति से लगता है जैसे मोदी सरकार भ्रस्टाचार नहीं बल्कि अपने कोंग्रेस मुक्त भारत के लिए लड़ाई लड़ रही है.

बेहतर तो यह होता की जब रफाल डील के वक़्त भाजपा सरकार सीबीआई जाँच से इंकार नहीं करती या बीते 5 सालों में लोकपाल बिल को लागु करने में जैसे मोदी सरकार ने अपने पांव पीछे न खिचती.

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