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क्या भाजपा+ और विरोधियों के दावे होंगे पूरे?

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अब चुनावी सरगर्मी समाप्त है और मतदान के साथ ख़त्म है तमाम नोंकझोक अब सभी 23 मई को आने वाले परिणामों पर टकटकी लगाये हैं। लोकसभा चुनाव में अंतिम चरण का मतदान समाप्त होने के साथ ही TV News Channels की ओर से एग्ज़िट पोल दिखाये जाने लगे।

यदि EXIT POLL के लब्बोलुवाब को निचोड़ा जाए, तो सत्तासीन भाजपा के नेतृत्व वाले राजग अर्थात राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन-NDA दोबारा सत्ता की ओर लौट रही है।

एग्जिट पोल बता रहा है कि राजग के पाले में 300 या इससे अधिक सीटें जीतने का अनुमान है। किसी भी पार्टी या गठबंधन को केंद्र में सरकार गठन के लिए 273 सीटों से majority जुटाना ही पड़ेगा।

एग्जिट पोल को अलग करके निहारना आवश्यक इसलिए भी है क्योंकि भाजपा किस आधार पर सरकार गठन के दावे कर सकने की स्थिति में है। दरअसल, भाजपा डंके की चोट के साथ कह रही है कि वह अकेले दम पर 300 से अधिक सीटें पाने जा रही है। सिर्फ उसे उत्तर प्रदेश में 74 से अधिक सीटें हाथ लगेंगी, पार्टी ऐसा 2014 में उत्तर प्रदेश में अपने गठबंधन को मिली 73 सीटों के आधार पर कह सकती। हालांकि अब तक आये एग्जिट पोल के आधार पर पार्टी ऐसा नहीं कह रही है, बल्कि उसे लगता भी है कि SP-BSP-RLD गठबंधन में दम नहीं बचा है, इस आधार पर भाजपा ऐसा विश्लेषण कर रही है और इसी बुनियाद पर भाजपा उत्तर प्रदेश में 74 सीटें मिलने का कयास लगाये बैठी है और साथ ही उसे लोकसभा में 300 से अधिक सीटें मिलने का मार्गप्रशस्त होता दिख रहा है।

एग्जिट पोल में भाजपा को अधिक सीटें मिल रही हैं, किन्तु इस सच्चाई को भी समझना पड़ेगा कि इस बार शेष दलों की स्थिति जबरदस्त रूप से सामने आई दिख भी रही है। इस तरह की सोच के विश्लेषण का बड़ा कारण यह भी है कि भाजपा के साथ अब वे दल या दोस्त नहीं हैं, जो कभी थे। चूंकि अब एग्जिट पोल आ चुके हैं और राजग सरकार बनाने की ओर बढ़ती दिख भी रही है, किन्तु इस समय एक जबरदस्त चुनौती भी मुंह बाये खड़ी है कि गैर भाजपा वाली क्षेत्रीय पार्टियां दमखम से साथ न उभर पर आ जायें। कांग्रेस और भाजपा, दोनों राष्ट्रीय पार्टियां इस जुगाड़ में होंगी कि इन गैर राजग और गैर महागठबंधन में से कुछ लोगों से स्वयं का तार मिलाया जाए।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी दावा कर चुके हैं कि नरेंद्र मोदी अब केंद्रीय सत्ता में नहीं लौटने वाले। अब प्रतीत हो रहा है कि उनका ये दावा सच होने नहीं जा रहा है। अब तक आये एग्जिट पोल के निचोड़ में देखें, तो भाजपा दमखम के साथ लौटती दिख रही है। अगर कुछ दूसरे एग्जिट पोल के गणित हो समझें, तो मुमकिन है कि क्षेत्रीय पार्टियों और कांग्रेस नरेंद्र मोदी के मार्ग में रुकावटें बन सकती हैं।

राजग को बहुमत न मिला तो…
यदि राजग को बहुमत नहीं मिलता है, तो वह जगन मोहन रेड्डी और टीआरएस की ओर देख सकती है। चुनाव प्रचार केअंतिम दिन दिखा था कि प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति में संवाददाता सम्मेलन में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने बताया था कि हम जैसे भी हों, किंतु हम उन दलों का दिल से स्वागत करते हैं जो हमारी विचारधारा को देखते हुए राजग का अंग बनना चाहें। इससे उम्मीदें तो यही हैं कि अब भाजपा अपने सभी दरवाजे औऱ खिड़कियों को खोले रखना चाहेगी।

भाजपा में इस बिंदु पर रणनीति बननी आरंभ हो गयी होगी कि दूसरी पार्टियों को कैसे महागठबंधन से दूर कर राजग में मिलाना है

कोई भी एग्जिट पोल ऐसा नहीं दिख रहा है, जिसमें कांग्रेस को अपने बलबूते पर 100 सीटों की विजय दिख रही हो, ये अलग बात है कि 2014 में कांग्रेस की हैसियत 44 सीटों पर सिमट चुकी थी। अब कांग्रेस की सेहत में सुधर हुआ है।

आये आंकड़ों पर गौर करें तो ऐसा नहीं लगता कि कांग्रेस के किसी खेमे की ओर से आवाज सुनाई दे कि राहुल गांधी का नेतृत्व नाकाम रहा। ये बात अवश्य देखनी पड़ेगी कि पार्टी की महासचिव PRIYANKA GANDHI से जिस तरह की आशाएं लोगों ने की थीं, ऐसा प्रतीत होता है कि वे मजबूती से उभर नहीं सकीं, साथ ही खुद उनकी उम्मीदें पूरी नहीं हो पायीं।

क्या नाकाम होंगे प्रियंका के सपने

पूर्वी यूपी की ज़िम्मेदारी प्रियंका को सौंपी गयी थी, किंतु इस सूबे में कांग्रेस की हालत में एग्ज़िट पोल में भी सुधरती नहीं दिख रही है। इसकी कई बड़ी वजहें हैं। पहला, कांग्रेस की ‘न्याय योजना’ की व्यवहारिकता यथार्थ पर आम लोग लोगों को यकीन नहीं रहा है, बल्कि कुछ दिन से लोग यह पूछ रहे हैं कि क्या ऐसा हो पायेगा। दूसरा बड़ा और महत्वपूर्ण कारण यह है कि कई स्थानों पर कांग्रेस संगठन करीब-करीब सूख चुका है।

कैसे उभरती है एग्जिट पोल से सटीक तस्वीर

क्या UP में कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ना सही फ़ैसला था? आप देख सकते हैं कि चुनाव-पूर्व SP, BSP आपस में कटु रिश्तों के साथ सालों-साल रहे, लेकिन चुनावों ने दोनों एक-दूसरे के पिछलग्गू बने रहे। उनके सामने हर बार झुकेंगे तो ये कांग्रेस के लिए सुखद नहीं रहता है। एक और महत्वपूर्ण बिंदु, और वह यह कि अगर एग्जिट पोल में कांग्रेस 44 से 80 तक कूदी है तो ये उनके लिए सुखकारी समाचार है, किंतु PM पद के लिए दावेदारी ठोकने वाली कांग्रेस को अभी काफी परिश्रम करना पड़ेगा।

अब यह कहना कि कांग्रेस ने गठबंधन के पक्ष में झुकाव नहीं दिखाकर गलती की, तो उन लोगों की मज़बूरी हम समझ सकते हैं, कांग्रेस के लिए जाति महत्वपूर्ण है। कांग्रेस भले ही सबसे पुराना राष्ट्रीय दल हो और उसे आम लोग कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जानते और मानते रहे हों, लेकिन अब राजनीतिक फलक बदला है और अब उसे अपनी राष्ट्रीय छवि के लिए पहले से अधिक परिश्रम करना पड़ रहा है। इसीलिए उसके व्यवहार में परिवर्तन भी दिखता है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा और ममता की रस्साकशी में किसे लाभ ?

पश्चिम बंगाल में अब साम्यवादी सरकार का दौर लौटने की कहीं से चर्चा नहीं होती और अब यह राज्य ममता के कथित ममत्व की छांव में है, ऐसा इसलिए क्योंकि इस बार के चुनाव प्रचार के साथ ही बंगाल में कई हिंसक की घटनाएं हुईं और समूचे भारत के लोगों को ‘भालो-मिष्टी भालो’ की मिठास बंगाल में कहीं दिखी ही नहीं, इस बीच मतदान के ठीक बाद आये एग्जिट पोल में पश्चिम बंगाल में भाजपा दहाई अंकों में सीटें पाती दिख रही है। भाजपा बंगाल में इस बार कुछ ज्यादा परिश्रम करती दिखी, इसे देखते हुए तृणमूल कार्यकर्ता भी डरे हुए थे। उन्हें आशंका थी कि बाजी पलट गयी, तो क्या होगा?

मोदी के नेतृत्व वाली वर्तमान भाजपा का आकलन था कि 10 से 15 बड़े लोग भाजपा से बातचीत कर रहे हैं और इसीलिए मतदान पश्चात् अब देखना पड़ेगा कि अब कितनी संख्या में लोग किस पार्टी में आएंगे। वैसे भी पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में गतिविधियां बढ़ सकती हैं और उसे इसका फायदा हो सकता है, किन्तु तृणमूल कांग्रेस चुप नहीं रही. इसलिए आगामी समय में भाजपा और तृणमूल में कड़वाहट और भी बढ़ेगा।

अब एक और महत्वपूर्ण तीसरे मोर्चे की बात। इस मोर्चे का चेहरा कौन होने जा रहा है, मतदान से परिणामों के आने के बाद ये पता चलेगा, किन्तु यदि कांग्रेस के पास जरूरी सीटें आयीं, तो वह गैर भाजपा दलों के साथ सरकार गठन के दावे कर सकती है, किन्तु यह भी मुमकिन है कि यदि भाजपा इन दलों को साम-दाम-दंड-भेद से अपने समूह में सम्मिलित कर लेती है और इसके लिए अनेक लुभावनी लालच के पांसे भी सामने फेंकती है, तो ये दल भाजपा से भी हाथ मिला लें, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है।

अब यह समझने की आवश्यकता है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने दक्षिण में तेलंगाना, केरल और आंध्र प्रदेश में अनेक रैली कीं और टीआरएस की आलोचना नहीं की, अपितु कांग्रेस पर वह हमले करती रही, ऐसे में आंध्र में निशाना वाईएसआर नहीं, बल्कि टीडीपी ही खूब रहा।

चुनाव अभियानों में ही स्पष्ट हो रहा था कि वह यहां से टीडीपी के मुकाबले किसी ओर का सहारा पाने की सोच सकती है, लेकिन ओडिशा में भाजपा ने नवीन पटनायक की भरपूर आलोचना की। यहां तक कि उन्हें ‘भ्रष्ट’ तक करार दिया किन्तु लोगों ने देखा कि जब चक्रवाती तूफ़ान टपका और पीएम ओडिशा पहुंचे, तो नवीन पटनायक की भरपूर प्रशंसा ही की। उनके रंग-ढंग ऐसे बोलते थे, जैसे भविष्य में दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। तमिलनाडु का विश्लेषण करें, तो इस तमिलभाषी राज्य में यदि 6 से 7 सीटें राजग को मिल जाती हैं, तो वे एआईएडीएम के पक्ष की सीटें ही होंगी। लेकिन अब यहां एआईएडीएमके के पक्ष में ये दिखना भी आवश्यक है, क्योंकि यहां UPA दमदार दिख रहा है।

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